Hindi Stories-हिंदी कहानियाँ
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कहानियाँ हमारे जीवन में अद्भुत छाप छोड़ती है। ‘‘हिन्दी कहानियाँ’’ रोचक, ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक होती है जो एक-एक कहानी मोती के तुल्य है। जिसको पढ़कर अपने जीवन में लक्ष्य की प्राप्ति तथा बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
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Best Inspirational Stories in Hindi-प्रेरक हिन्दी कहानियाँ
लहर ले जाए
उसका नाम था डेनोवस्की। आस्ट्रेलिया में रहता था। डेनोवस्की एक सफल व्यापारी था। कई देशों में उसका कारोबार फैला था। उसका परिवार हर प्रकार से सुखी और प्रसन्न था। परिवार में पत्नी मार्का और दो बच्चे थे।
डेनोवस्की माल लेकर जहाजों में दूर-दूर की यात्राएँ किया करता था। उसने अनेक देश देखे थे। यात्राओं से लोटकर वह पत्नी और बच्चों को अपनी यात्राओं के अनुभव सुनाया करता था। सुनकर वे कहते थे-‘‘ कभी हमें भी अपने साथ ले चलिए। हम भी देखें, दुनिया कितनी अनोखी और रोमांचक है।’’ डेनोवस्की हँसकर कहता -‘‘ हाँ-हाँ क्यों!’’
एक बार बच्चों की छुट्टियाँ हुई। डेनोवस्की ने पत्नी से कहा-‘‘हम लोग एक साथ छुट्टियाँ मनाने चल रहे हैं। सफर की तैयारियाँ कर लो।’’ डेनोवस्की की बात सुन, मार्का और दोनोें बेटे उत्साह और उमंग से भर उठे। जल्दी-जल्दी तैयारी की गई और फिर एक दिन उनका जहाज बंदरगाह से चल दिया।
दिन में मौसम सुहावना और समुद्र शांत था। धीमी हवा बह रही थी। डेनोवस्की के बेटे इस यात्रा से बहुत खुश थे। उन्हें पहली बार नये-नये देश देखने का मौका मिलने वाला था।
जहाज के नाविक अपने काम में कुशल थे। उन्हीं में से कुछ भोजन भी बनाते थे। शाम के भोजन का आनंद डेनोवस्की परिवार ने खुले डेक पर लिया। बच्चों को बहुत मजा आया। रात होते-होते मौसम ठण्डा हो गया। तेज हवाएँ बहने लगीं, फिर समुद्र अशान्त हो उठा। जहाज डोलने-डगमगाने लगा। समुद्र गरजने लगा। ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही थी।
नाविकों से डेनोवस्की ने कहा-‘‘तूफान की गति बढ़ रही है। हमंें सावधान रहना है।’’ मार्का और बच्चे जाग रहे थे और काफी घबराए हुए दिखाई दे रहे थे। डेनोवस्की ने कहा-‘‘इस तरह के अनेक तूफान कई बार झेल चुका हूँ मैं। घबराने की जरूरत नहीं। हमारा जहाज मजबूत है। हम सुरक्षित रहेंगे।’’
तूफान और भी तेज हो गया। ऊँची- ऊँची लहरें जहाज को इधर-उधर हिला रही थीं। पानी की बौछारें लगातार आ रही थीं, जिससे जहाज में पानी भरने लगा। जहाज में हलचल मच गई। अब तो डेनोवस्की को भी चिन्ता होने लगी। उसे अपने से अधिक पत्नी और बच्चों का ध्यान था। उन लोगों का यह पहला अनुभव था।
लहरोें में फँसकर जहाज अपने रास्ते से भटक गया। उस दौरान नाविको के लिए दिशा का अनुमान लगाना कठिन हो रहा था। अपनी राह से भटककर जहाज एक द्वीप के निकट जा पहुँचा और चट्टानों से टकरा गया।
नाविक लहरों में कूद पड़े। उन्होंने डेनोवस्की तथा उसकी पत्नी और बच्चों को सुरक्षित द्वीप पर पहुँचा दिया। डेनोवस्की ने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वे भयानक तूफान से सही सलामत निकल आए थे। प्राण बच गए, परन्तु जहाज डूब गया और उसमें लदा माल भी।
द्वीप निर्जन था। वे सभी भीगे हुए और भूखे थे। जैसे-तैसे आग जलाई गई फिर नाविकों ने तीन छोटी-छोटी झोंपड़िया तैयार की। अब वे खराब मौसम तथा अनजान वन्य जीवों से बच सकते थे।
डेनोवस्की को आशा थी कि कोई जहाज चटापू के पास से गुजरेगा तो वे वहाँ से बचकर निकल जायेंगे। वह तथा नाविक ऊँचे स्थान पर खडे़े होकर समुद्र की ओर देखते रहे। इसी तरह कई दिन बीत गए। कोई जहाज द्वीप के पास से नहीं गुजरा। मार्का और बच्चे निराश हो चले। बच्चों की छुट्टियाँ ऐसी खराब बीतेंगी इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी उन्होंने।
धीरे-धीरे निराशा गहरी होती गई।
एक दिन डेनोवस्की तट पर घूम रहा था। उसके मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे। तभी उसने लहरों पर एक बोतल तैरती हुई देखी। वह पानी में कूद पड़ा और बोतल को निकाल लाया। उसने कुछ सोचा, फिर एक कागज पर लिखा-‘‘ हम निर्जन द्वीप पर फँसे हुए हैं। हमारा जहाज चट्टानों से टकराकर डूब चुका है। हमें मदद चाहिए।-डेनोवस्की।’ यह पत्र उसने बोतल में रखकर उसे बंद कर दिया, फिर बोतल पानी में फेंक दी।
उन्हीं दिनों मार्का को ज्वर हो गया। परेशान हो उठे। डेनोवस्की को पौधों की पहचान थी। उसने द्वीप पर घूमकर कुछ जड़ी बूटियाँ इकट्ठी की। उनका काढ़ा तैयार करके मार्का को पिलाया। बच्चों और नाविकों को भी दिया। दवा ने असर दिखाया। मार्का का ज्वर उतरने लगा। डेनोवस्की की चिंता कुछ कम हुई।
सच्ची जीत
उधर कुछ दिन बाद, मछुआरे समुद्र में मछलियाँ पकड़ रहे थे। तभी एक मुछआरे ने एक बोतल को लहरों पर डोलते हुए देखा। उसने बोतल उठाई तो उसमें कागज नजर आया। मछुआरा बोतल को लेकर अपने मालिक विलियम के पास गया। उसने पत्र निकालकर पढ़ा। डेनोवस्की का नाम देखकर वह चैंक पड़ा। विलियम और डेनोवस्की पक्के मित्र थे। दोनांे मिलकर व्यापार भी करते थे। इधर काफी समय से विलियम अपने मित्र से नहीं मिला था।
विलियम उसी समय डेनोवस्की की खोज में निकल पड़ा। उसने कई द्वीपों पर अपने मित्र को खोजा। वह एक द्वीप के पास से गुजर रहा था तभी कुछ आवाजें सुनाई दीं। विलियम उस द्वीप पर जा पहुँचा वहाँ डेनोवस्की तथा उसके साथी पहले से तट पर आ खड़े हुए थे। उन्होंने भी गुजरने जहाज को देख लिया था।
डेनोवस्की और विलियम गले मिले। विलियम ने बताया कि बोतल में मिला संदेश ही उसे वहाँ तक ले आया था। उसके बाद सब विलियम के जहाज पर बैठकर चल दिये।
डेनोवस्की को काफी नुकसान हुआ था। लेकिन वह खुश था कि उसका परिवार एक भयानक संकट से सकुशल निकल आया था। नाविकों ने भी संकट के समय डेनोवस्की का नया रूप देखा था। निर्जन द्वीप पर बीमारी के दौरान उसने नाविकों की खूब देखभाल की थी।
लौटकर कुछ दिन वे लोग विलियम के पास रूके। इसी बीच डेनोवस्की ने एक नया जहाज खरीदा और उसमें बैठकर अपने नगर जा पहुँचा। तट पर जहाज से उतरते हुए बच्चों ने कहा-‘‘ यह रोमांचक यात्रा हमेशा याद रहेगी।’’ सुनकर डेनोवस्की धीरे से हँस पड़ा।
आकाश से गिरा
धूमकेतु नाम का एक तांत्रिक था। वह तंत्र विद्या में पारंगत था। तंत्र-मंत्र के लिए प्रतिदिन नए प्रयोग करता रहता। एक बार उसे आश्चर्यजनक सफलता हो गई। मंत्र शक्ति द्वारा एक निश्चित नक्षत्र में सोने की वर्षा करवा पाने में वह सफल हो गया। उसने इस मंत्र का कई बार प्रयोग किया। वह हमेशा सफल रहा।
धूमकेतु का एक शिष्य था। उसका नाम लब्धबुद्धि था। वह उसे अतिप्रिय था। लब्धबुद्धि अपने गुरु से स्वर्ण वर्षा वाला मंत्र सीखना चाहता था। धूमकेतु यह मंत्र किसी को भी नहीं सिखाना चाहता था। पर शिष्य ने हठ ठान ली। अन्त में गुरु को हठ के आगे झुकना पड़ा। मंत्र सिखाने के लिए उसने कहा-‘‘ यदि तुमने इस मंत्र का प्रयोग किसी दूसरे के सामने किया, तो एक बार सफल हो जाओगे। मगर फिर हमेशा के लिए मंत्र को भूल जाओगे।
लब्धबुद्धि ने गुरु की शर्त स्वीकार कर ली। धूमकेतु ने मंत्र सिखा दिया। दोनों गुरु-शिष्य अन्य साधु-संतों की तरह नहीं रहते थे। स्वर्ण वर्षा वाला मंत्र जानते थे। इसलिए संपंन व्यक्तियो की तरह रहा करते थे।
एक दिन की बात, गुरु और शिष्य जंगल से होकर जा रहे थे। जंगल में डाकुओं का आतंक था। डाकुओं से बचते हुए वे आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे।
दुर्भाग्यवश डाकुओं से उनका आमना-सामना हो गया। डाकुओं ने उनको पकड़ लिया। दोनों की तलाशी ली, किन्तु कुछ न मिला। वे वेशभूषा से सम्पन्न व्यक्तियांे की तरह लग रहे थे। फिर भी उनके पास कुछ न मिलने से डाकुओं को आश्चर्य हुआ। डाकुओं ने लब्धुद्धि को बंधक बना लिया और धूमकेतु को छोड़ दिया। साथ ही कहा-‘‘ यदि एक सप्ताह में एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ लाकर नहीं दोगे, तो हम इसे मार देंगे।’’
यह सुन गुरु और शिष्य बहुत दुखी हुए। धूमकेतु ने मन ही मन काल गणना की। उसे यह जानकर खुशी हुई कि तीन दिन बाद स्वर्ण वर्षा वाला नक्षत्र आने वाला है। डाकुओं के चंगुल से छूटकर जाने से पूर्व धूमकेतु ने लब्धबुद्धि के कान में यह बात कह दी। उसे आश्वासन दिया कि वह न घबराए। ‘‘एक सप्ताह में मैं तुम्हें छुड़वा ले जाऊँगा।’’ यह सुनकर लब्धबुद्धि की चिंता कुछ कम हुई।
वहाँ से जाते समय धूमकेतु ने शिष्य को एक बात के लिए और सावधान किया-‘‘ भूलकर भी स्वर्ण वर्षा वाले मंत्र की बात जुबान पर न लाना। नक्षत्र आ जाने पर स्वर्ण वर्षा करवाने की गलती तो किसी भी हालत में मत करना। यदि ऐसा किया तो परिणाम अच्छे नहीं निकलेंगे। तुम मंत्र का प्रयोग भूल जाओंगे और ये लोग लालच के कारण तुम्हें नहीं छोड़ेंगे, हो सकता हैं प्राण भी ले लें।’’
शिष्य को समझाकर धूमकेतु चला गया। मगर लब्धबुद्धि को डाकुओं के चंगुल में रहना ठीक नहीं लग रहा था। डाकू स्वादिष्ट भोजन करते और उसे रूखा-सूखा खाकर आधे पेट रहना पड़ता। वे मौज मनाते और वह रस्सियों मेें बँधा पड़ा रहता। लब्धबुद्धि किसी भी तरह उनकी गिरफ्त से छूटना चाहता था। इसीलिए अधीर होकर स्वर्ण वर्षा वाले नक्षत्र की प्रतीक्षा कर रहा था।
इन्हीं परेशानियों और अधैर्य के कारण उसे गुरु के प्रति अविश्वास होने लगा-‘ न जाने गुरु जी मंत्र साधना करेंगे या नहीं.....? कहीं गुरु जी को कोई जंगली जानवर न खा गया हो.......।’ इस तरह की आशंकाओं के कारण विश्वास डगमगा गया। बस, उसने स्वयं ही मंत्र साधना करने का निश्चय किया।
स्वर्ण वर्षा नक्षत्र वाला समय भी आ गया। उसने डाकू दल के सरदार से बंधन खोलने की प्रार्थना की। फिर स्वर्ण वर्षा वाली साधना के बारे में बताते हुए कहा-‘‘मैं तुम्हें एक हजार स्वर्ण मुद्राओं से अधिक दूँगा। तुम सोना बटोरते हुए थक जाओगे।’’ डाकू दल को विश्वास तो नहीं हुआ, फिर भी डाकुओं ने उसे बंधन मुक्त कर दिया।
लब्धबुद्धि ने मंत्र साधना की। सचमुच वहाँ सोने की वर्षा होने लगी। डाकू तो जैसे पागल हो गए। अब लब्धबुद्धि वहाँ से खिसक जाना चाहता था। वैसे भी एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देने का उसका वादा पूरा हो चुका था। पर सरदार के इशारे पर उसे पुनः पकड़ लिया गया। भला डाकू उसे कैसे जाने दे सकते थे।
इसी दौरान डाकुओं में स्वर्ण के बटवारे को लेकर झगड़ा हो गया। प्रत्येक सदस्य मनचाही मात्रा में सोना लेना चाहता था। कुछ ही देर में उनको सोना कम लगने लगा। वे लब्धबुद्धि पर एक बार फिर स्वर्ण वर्षा करवाने का दबाव डालने लगा। लब्धबुद्धि ने उन्हें गुरु की शर्त और नक्षत्र वाली बात समझानी चाही। पर डाकू उसे बहाना मान रहे थे। क्रोध में आकर एक डाकू ने उसे खूब मारा और रस्सी से जकड़ दिया।
इसके बाद डाकुओं के झगड़े और बढ़ गए। वे परस्पर लड़ने लगे। उनमें मारकाट मच गई। उन्होंने आपस में एक-दूसरे को मार गिराया। अन्त में केवल दो डाकू बचे। उन्होंने आपस में मिल-बाँटकर सोना लेना तय कर लिया। फिर लड़ाई बन्द कर दी।
लड़ते हुए वे थक भी गए थे। भूख और प्यास से बेहाल थे। इसीलिए पहले तो उन्होंने खाना बनाया। खाना बनाकर एक डाकू सरोवर से पानी लेने चला गया।
दोनों ने झगड़ा तो बंद कर दिया था किन्तु लालच की वजह से मन ही मन षड्यंत्र नहीं त्यागा था। वे एक-दूसरे को मार देना चाह रहे थे। जो पानी लेने गया था, वह पानी में जहर मिलाकर ले आया। उधर दूसरे डाकू ने भोजन में जहर मिला दिया। आपस में चालबाजी के कारण दोनों ही डाकू बेहोश हो गए।
कुछ ही देर में धूमकेतु एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ लेकर वहाँ आ गया। उसे देखते ही लब्धबुद्धि फूट-फूटकर रोने लगा। फिर उसने गुरु को पूरी घटना बता दी। धूमकेतु ने शिष्य के बंधन खोले। फिर कहा- ‘‘मैंने तुम्हें पहले सावधान किया था। लालच ने डाकुओं को नष्ट कर दिया। आओ, हम प्रण करें कि आज के बाद स्वर्ण वर्षा वाले मंत्र का उपयोग कभी नहीं करेंगे। साधारण जनों की तरह संतोष से रहेंगे।’’
लब्धबुद्धि ने रोते-रोेते गुरु के चरण पकड़ लिये। बोला-‘‘आपने ठीक कहा, मुझे ऐसा सोना नहीं चाहिए।’’
कोतवाल
पूरे शहर में महात्मा जी की चर्चा थी। दूर-दूर से लोग उनके दर्शन करने आ रहे थे। शहर के कोतवाल ने भी सोचा कि चलकर महत्मा के दर्शन किये जाये।
कोतवाल ने उम्दा पोशाक पहनी और घोड़े पर सवार होकर चल दिया। शहर का कोतवाल होने के नाते उसे अपने पद का बहुत घमंड था। छोटी-छोटी बात पर रोब दिखाना, लोगों पर कोड़े बरसाने जैसी उसकी आदत बन गयी थी।
कोतवाल घोड़े पर चढ़ा चला जा रहा था। थोड़ी देर जाने पर उसे एक आदमी मिला, जो रास्ते के दोनों तरफ से कंकड़-पत्थर उठा रहा था और झाड़-झंखाड़ साफ कर रहा था। कोतवाल ने अपनी आदत के अनुसार उस पर भी रोब जमाया-‘‘तुम कौन हो? इस वक्त यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हें मालूम नहीं मैं कौन हूँ? मैं इस शहर का कोतवाल हूँ।’’
वह आदमी बिन कुछ जवाब दिये अपने कार्य मंे लगा रहा।
कोतवाल ने दोबारा वही बात दोहराई, तो वह आदमी कुछ जवाब देने के स्थान पर हँस पड़ा। कोतवाल को यह अपना अपमान लगा। वह गुस्से से भर उठा। कड़कती आवाज में उस आदमी से पूछा-‘‘ सुनो, पता चला है कि यहाँ कोई महात्मा जी आए हैं। बताओ, वह कहाँ रहते हैं? चलो रास्ता दिखाओ।’’
उस आदमी ने इस बार भी कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप अपने कार्य में व्यस्त रहा। अब तो कोतवाल के गुस्से की सीमा न रही। उसने कोड़ा निकाला और उस आदमी पर बरसाना शुरू कर दिया। मारते हुए कहता जा रहा था-‘‘तुमें नहीं मालूम, मैं शहर का कोतवाल हूँ।’’
कोड़े खाकर भी वह आदमी पहले की तरह सड़क से कंकड़-पत्थर साफ करता रहा। कोतवाल के क्रोध में उस आदमी को धक्का देकर गिरा दिया और आगे चल पड़ा। चलते-चलते कहता गया-‘‘तुम मुझे नहीं जानते। महात्मा जी का पता न बताने की सजा मिली है तुम्हें। मैं उनके दर्शन करना चाहता हूँ।’’
आगे जाकर कोतवाल ने अन्य लोगों से महात्मा जी के बारे में पूछता की।
एक व्यक्ति ने कहा-‘‘ कोतवाल साहब, क्या आपको महात्मा जी का पता पीछे नहीं मिला। उनके ठहरने का स्थान तो पीछे ही छूट गया है। आप लौट जाइए। आपको महात्मा जी वहीं कहीं मिल जायेंगे।’’
‘‘लेकिन मैं उन्हे पहचानूँगा कैसे?’’-कोतवाल ने पूछा।
‘‘उन्हें पहचानना बहुत आसान है। वह रास्ते पर पड़े कंकड़-पत्थर साफ करते मिल जायेंगे।’’- उस व्यक्ति ने बतलाया।
यह सुनते ही कोतवाल को ध्यान आया कि ऐसा आदमी तो उसने रास्ते में देखा था और उसे मारा भी था। जब उसे पता चला कि वही महात्मा जी हैं, तो वह तुरन्त वापस चल दिया।
कोतवाल लौटकर उसी जगह पहुँचा, तो उसने देखा महात्मा जी के सिर से खून बह रहा है, पट्टी बँधी है लेकिन वह हैं कि पथ की सफाई किये जा रहे हैं। आस-पास बहुत सारे लोग जमा थे।
कोतवाल को जब अपनी भूल पता चली। वह लज्जित होकर घोड़े से उतरा और महात्मा जी के चरणों में गिर पड़ा। दुखी स्वर में बोला-‘‘ मुझे क्षमा कीजिए महाराज! लेकिन आप इतने बड़े महात्मा होकर सड़क के कंकड़-पत्थर क्यों साफ करते हैं?’’
बड़े ही सौम्य स्वर में महात्मा जी बोले-‘‘ हमें अपने अन्दर और बाहर का मार्ग साफ रखना चाहिए। क्रोध, घमंड, लालच के काँटे व कंकड़-पत्थर हटाते रहना चाहिए। मैं वही कर रहा हूँ।’’
कोतवाल ने बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनीं। उसे अपने कुकर्म पर पश्चाताप् हो रहा था। कहने लगा-‘‘ प्रभु, आप महान हैं। मैंने अपशब्द कहे, मारपीट की फिर भी आपने मुझे कुछ नहीं कहा।’’ कहकर वह ग्लानि से रो पड़ा।
महात्मा जी ने बड़े प्रेम से कहा-‘‘ तुमसे कोई गलती नहीं हुई। तुम मेरी खोज में निकले थे न! इंसान मिट्टी के बर्तन को भी ठोक-पीटकर देखता है, तब खरीदता है। तुम एक महात्मा को ढूँढ़ रहे थे। जो हुआ उसके लिए पश्चाताप मत करो।’’
कोतवाल का घमण्ड आँसुओं में बह गया।
सोने की चाबी।
एक था बूढ़ा बढ़ई। नाम था राम निवास। एक बार कहीं जा रहा था, तो उसे रास्ते में लकड़ी का टुकड़ा पड़ा हुआ दिखाई दिया। जो बूढ़े बढ़ई ने सोचा-‘‘इससे कुछ नई चीज बनाऊँगा।’’ घर आकर उसने लकड़ी छीलनी शुरू करी, तो आवाज आई-‘संभलकर।’
आवाज सुनकर राम निवास चैंक पड़ा क्योंकि कमरे में वह अकेला था। ‘यह कौन बोला?’-उसने सोचा। और फिर अपना काम करने लगा। वही आवाज फिर आई-‘रुको, रुक जाओ। दर्द हो रहा है।’ राम निवास ने ध्यान से सुना-आवाज लकड़ी के टुकड़े में से आ रही थी। वह डर गया-‘किसी भूत प्रेत का चक्कर तो नहीं।’ उसी समय राम निवास का दोस्त बिरजू अन्दर चला आया। पहले वह सड़कों पर घूम-घूमकर खेल दिखाया करता था। अब बूढ़ा हो गया था। खाली घूमता था।
राम निवास ने बूढ़े बिरजू से कहा -‘‘सुनो, लकड़ी का यह टुकड़ा घर ले जाओ। इसे छील-तराशकर एक पुतला बना लो। पुतले को लेकर तमाशा दिखाओं तो आमदनी होने लगेगी। यों खाली नहीं भटकना पड़ेगा।’’
बिरजू को दोस्त का सुझाव अच्छा लगा। उसने लकड़ी उठाई और अपनी कोठरी में ले गया। बिरजू गरीब था और अकेला। वह सोचा करता था-‘‘काश, कोई मेरी मदद करता।’’ बिरजू ने लकड़ी को छील तराशकर एक कठपुतला बनाया। उसका नाम रखा-रमन्ना।
उसने कठपुतला तैयार करके फर्श पर रखा ही था कि एक अजीब बात हुई। रमन्ना उछला और कोठरी से बाहर भाग गया एक जीते-जागते नन्हें बच्चे की तरह। बिरजू उसे आवाज देता रह गया-‘‘ रमन्ना, मेरे बच्चे, सुन तो सही।’’ वह उदास हो गया। लग रहा था, जैसे कोई बहुत कीमती चीज खो गई है। पर उदासी जल्दी ही जाती रही क्योंकि इधर-उधर घूम फिरकर रमन्ना घर में लौट आया। बिरजू ने उसे गोद में उठा लिया और बोला-‘‘ मेरे बच्चे, तू कहाँ चला गया था?’’
इस तरह कठपुतला बिरजू के साथ उसकी टूटी-फूटी कोठरी में रहने लगा। एक सुबह वह बाजार घूमने निकल पड़ा। थोड़ी दूर पर बाजे बजने की आवाज आई। रमन्ना उस तरफ चल दिया। वह एक कठपुतली थियेटर था। खेल शुरू होने वाला था। दर्शक टिकट लेकर अंदर जा रहे थे। रमन्ना का मन हुआ वह भी खेल देखे। वह भीड़ में शामिल होकर अंदर पहुँच गया और सबसे आगे जा बैठा।
खेल शुरू हुआ। मंच पर कठपुतलियाँ थिरक रही थीं। तभी एक कठपुतली ने कहा-‘‘अरे, हमारा भाई दर्शकों के बीच बैठा क्या कर रहा है। उसे तो हमारे साथ होना चाहिए।’’ यह सुनते ही रमन्ना कूदकर मंच पर पहुँच गया। वह देख दर्शक शोर करने लगे।
शोर सुनकर थियेटर का मालिक तेजपाल ने रमन्ना को गरदन से पकड़ लिया। चिल्लाकर बोला-‘‘तुमने खेल चैपट कर दिया। मैं तुम्हें नहीं छोडूँगा।’’ वह रमन्ना को अपने कमरे में ले गया। वहाँ अंगीठी में आग जल रही थी। वह गुर्राया-‘‘मैं तुम्हें अंगीठी में जला दूँगा।’’
यह सुन रमन्ना रो पड़ा। बोला-‘‘मेरे बूढ़े बाबा रो-रोकर मर जायेंगे। मुझे क्षमा कर दीजिए। हमारे घर में खाने को कुछ नहीं है। मेरे बाबा का नाम बिरजू है।’’ आखिर तेजपाल को रमन्ना पर दया आ गई। उसने कहा-‘‘जाओं, घर जाओ। मेरी ओर से उसे सोने के पाँच सिक्के भी दे देना।’’
रमन्ना ने चैन की साँस ली। सिक्के मुट्ठी में दबाकर घर की तरफ दौड़ चला। लेकिन घर पहुँच नहीं सका। रास्ते में उसे एक लोमड़ी और बिल्ली मिल गए। लोमड़ी तो सदा की चालाक ठहरी। उसने सिक्के देखे तो योजना बनाने लगी। उसने कहा-‘‘देखो रमन्ना, मैं तुम्हें सिक्के का पेड़ लगाने की तरकीब बताती हूँ। उसके बाद तुम्हारे बाबा की सारी परेशानी खत्म हो जाएगी।’’
बेचारा रमन्ना! वह लोमड़ी की चिकनी-चुपड़ी बातों में फँस गई। उसने घर जाने का इरादा छोड़ दिया। पहले वह पाँच सिक्को से पैसे का पेड़ लगाना चाहता था। रास्ते में लोमड़ी और बिल्ली बहाना बनाकर अलग हो गए। फिर नकाबपोश डाकुओं का वेश बना लिया और रमन्ना का पीछा करने लगी। अपने को अनजान जगह में अकेला पाकर रमन्ना घबरा गया था। वह लोमड़ी और बिल्ले को ढूँढ़ रहा था। रमन्ना का पीछा करते हुए दोनों फिसलकर गिर पड़े। पर फिर उन्होंने रमन्ना को पकड़कर पेड़ से उलटा लटका दिया। वे सोने के सिक्के लेना चाहते थे।
वहीं पास मेें एक महान था। वहाँ रहती थी आनन्दी नामक कठपुतली। वह तेजपाल के थियेटर में सबसे अच्छा खेल दिखाती थी। आनन्दी ने रमन्ना को पेड़ से लटके हुए देखा, तो अपने साथियों को बुलाया। चींटियों की फौज ने आनन-फानन में रमन्ना के बांध काट दिए, फिर उसका इलाज शुरू हो गया।
रमन्ना आनन्दी के घर में कई दिन तक रहा। जब कुछ ठीक हुआ, तो वहाँ से चल दिया। वह अब भी नहीं जानता था कि लोमड़ी और बिल्ला डाकू बनकर उसे परेशान करने वाले हैं। थोड़ा आगे दोनों रमन्ना को फिर मिले। उनकी नजर अब भी उसके सिक्के पर थी। वे उसे एक मैंदान में ले गये। कहा-‘‘यहाँ अपने सिक्के जमीन में गाड़कर पानी दो, फिर इंतजार करो। जल्दी ही पैसों का पेड़ उग आएगा।’’
रमन्ना उनके चक्कर में फँस ही गया। उसने सिक्के जमीन में गाड़ दिये और इंतजार करने लगा। उधर लोमड़ी और बिल्ला थाने जा पहुँचे। लोमड़ी ने थानेदार से कहा-‘‘ मैदान में एक चोर बैठा है। उसने चोरी के सिक्के जमीन में दबाए हैं। उसे गिरफ्तार कर लो।’’
पुलिस ने जासूस कुत्तों को भेजा। वे रमन्ना को पकड़ लाए। वह बेचारा बार-बार कह रहा था-‘मेरा कोई दोष नहीं है। मुझे छोड़ दो।’ लेकिन थानेदार के कहने पर उसे एक तालाब में फेंक दिया गया। रमन्ना तो लकड़ी का बना था। इसलिए डूबा नहीं। हाँ, वह घायल जरूर हो गया था।
तभी कूबर नामक बूढ़ा कछुआ उसके पास आया। उसने रमन्ना को बताया कि कैसे लोमड़ी ने उसे मूर्ख बना दिया था। कूबर ने कहा-‘‘ तेरे सिक्के उन दोनों ने मिलकर बाँट लिए और तुझे पुलिस के जाल में फँसा दिया। तू इतना भोला क्यांे है रमन्ना। दुनिया में सोच समझकर चलना चाहिए।’’
‘‘कछुए दादा, हमें इसकी मदद करनी चाहिए।’’
तालाब में रहने वाले जलचरों ने बूढ़े कूबर से प्रार्थना की। उन्हें रमन्ना पर दया आ रही थी।
‘‘ठीक है, मैं कोशिश करता हूँ।’’ कहकर बूढे़ कूबर ने पानी में डुबकी लगाई। वह काफी देर बाद ऊपर आया, तो उसके मुँह में सोने की चाबी थी। उसने चाबी रमन्ना को दे दी-‘‘ यह चाबी एक बूढ़े की है। वह यहाँ से पानी ले रहा था, तो चाबी पानी में गिर गई थी। शायद यह किसी ऐसे दरवाजे की चाबी है, जिसके पीछे खुशियाँ छिपी है। वह दरवाजा कहाँ है, यह खोजना तुम्हारा काम है। अब तुम जा सकते हो।’’ यह कहकर कूबर ने तालाब में डुबकी लगा दी।
रमन्ना आगे चला, तो उसे आजाद नामक पुतला मिला। वह भी तेजपाल के कठपुतली थियेटर में काम करता था। रमन्ना ने बताया कि कैसे आनन्दी ने उसे मौत के मुँह से निकाला था। वरना वह कबका मर गया होता।’’
आजाद ने कहा-‘‘तुम मुझे आनन्दी के पास ले चलो। मैं उससे मिलना चाहता हूँ। तुम्हारा चले आने के बाद सब पुतलियाँ तेजपाल के थियेटर से चली गई। मैं तभी सी आनन्दी को ढूँढ रहा हूँ।’’ रमन्ना आजाद को आनन्दी के पास ले गया। वह दोनों को देखकर बहुत खुश हुई, फिर बताने लगी कि किस तरह तेजपाल से परेशान होकर सब पुतलियों ने उसका थियेटर छोड़ दिया है। अभी वे बातें कर रहे थे, तभी एक मेढक वहाँ आया। उसने कहा-‘‘बूढे़ कूबर ने चाबी का भेद तेजपाल को बता दिया है। वह तुम सबको ढूँढ़ता फिर रहा है। जान बचाकर भागो।’’
दो जासूस कुत्तों की मदद से उनका पीछा करता हुआ तेजपाल आ पहुँचा, लेकिन रमन्ना ने फुरती दिखाई। पहले अपने साथियों को गुफा में छिपा दिया फिर वहाँ से निकल गया। उनका पीछा करते हुए तेजपाल लुढ़ककर चोट खा बैठा और कराहने लगा। आगे एक ढाबा था। वहाँ रमन्ना जाकर एक खाली घड़े में छिप गया। उसे उम्मीद थी कि तेजपाल को कुछ पता नहीं चलेगा। लेकिन उसने गलत सोचा था। उसे घड़े में छिपते हुए शैतान लोमड़ी और बिल्ले ने देख लिया था।
लोमड़ी ने तेजपाल को रमन्ना ने छिपने की जगह बता दी। तेजपाल ने घड़े को उलट दिया। रमन्ना बाहर आ गिरा, लेकिन तेजपाल उसे पकड़ न सका। रमन्ना उछलकर दूर जा गिरा और नौ दो ग्यारह हो गया। वहाँ से रमन्ना फिर उसी गुफा मेें पहुँचा, लेकिन वहाँ आनन्दी तथा दूसरे साथी न मिले। रमन्ना परेशान हो गया, तभी एक छछंूदर ने बताया-‘‘तुम्हारे साथियों को सिपाही पकड़कर ले गए हैं।’’
यह एक नई मुसीबत थी। लेकिन रमन्ना हिम्मत हारने वाला नहीं था, उसने आनन्दी को ढूँढ़ने का निश्चय कर लिया। वह तेजी से दौड़ा तो आगे एक बग्घी जाती दिखाई दी। उसमें आनन्दी और आजाद रस्सियों से बंधे दिखाई दिये। उसे एक लोमड़ी हांक रही थी। दो जासूस कुत्ते साथ-साथ चल रहे थे। रमन्ना ने आवाज लगाई-‘‘अरे, तुमने मुझे तो पकड़ा ही नहीं। क्या मुझे गिरफ्तार किये बिना ही चले जाओगे?’’ रमन्ना की आवाज सुनकर लोमड़ी घूमकर देखने लगा। इतने में गाड़ी पत्थरों से टकराकर उलट गई। लोमड़ी दूर जा गिरा। कुत्ते डरकर भाग गए। रमन्ना ने दौड़कर अपने साथियों के बंधन खोल दिये।
लेकिन अभी मुसीबत खत्म नहीं हुई थी। तेजपाल तो जोर -शोर से रमन्ना को ढूँढ़ रहा था। उसे विश्वास था कि थियेटर में गड़बड़ कराने में रमन्ना का ही हाथ था। रमन्ना और उसके साथी जान बचाने की तरकीब सोच रहे थे, तभी बूढ़ा बिरजू वहाँ आ पहुँचा। उसे किसी ने पूरी कहानी बता दी थी। वह तेजपाल से लड़ने के लिए लाठी लेकर आ पहुँचा था।
बिरजू की नजर सबसे पहले रमन्ना पर पड़ी। वह जोर से बोला-‘‘मेरे बेटे, तू कहाँ चला गया था? तुझे किसने परेशान किया था? मुझे उसका नाम बता दें, मैं उसे कड़ी सजा दूँगा।’’ सुनकर चालाक लोमड़ी और बिल्ला भाग गए। तेजपाल भी घबरा गया। पर फिर भी उसने कहा-‘‘ तुम्हारें रमन्ना ने मेरा धंधा चैपट कर दिया। मेरा खेल बंद हो गया। सारी कठपुतलियाँ भाग गई।’’
‘‘नहीं, हम यहाँ मौजूद है।’’ एक सम्मिलित आवाज सुनाई दी। सबने देखा तेजपाल के कठपुतली थियेटर में काम करने वाली सारी कठपुतलियाँ एक तरफ खड़ी थी। उनमें आनन्दी और आजाद भी थे। बिरजू के आ जाने से सबकी हिम्मत बढ़ गई थी।
‘‘जो चाहे ले लो, मेरी कठपुतलियाँ लौटा दो।’’-तेजपाल ने बिरजू से कहा।
‘‘ये मेरी कैद में नहीं हैं। पूरी तरह आजाद हैं। तुम इन्हें अपनी कैद में रखना चाहते हो। मैं ऐसा कभी नहीं होने दूँगा।’’-बिरजू ने कहा और मुसकराया। उसका खोया बेटा जो मिल गया था।
रमन्ना ने बूढ़े कछुए से मिली सोने की चाबी बिरजू को दे दी। वह बिरजू के घर में बने एक गुप्त दरवाजे की थी। सोने की चाबी से दरवाजा खुल गया। अंदर एक शानदार रंगमंच बना हुआ था। वहाँ अनेक कठपुतलियाँ थीं, जो चाबी भरने पर चलती-फिरती और खेल दिखाती थीं। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि रंगमंच पर रमन्ना का बड़ा चित्र लगा हुआ था-हूबहू उस जैसा।
बिरजू देर तक रमन्ना के चित्र को देखता रहा। फिर बोला-‘‘पता नहीं, किस जादूगर ने बनाया होगा यह रंगमंच और ये कठपुतलियाँ।’’
अगले दिन शहर में धूम मच गई। एक नया कठपुतली थियेटर आया था। मैदान में रंग-बिरंगा तम्बू लगा बहुत सारे दर्शक आए, फिर रमन्ना, आनन्दी और दूसरी कठपुतलियों ने अद्भुत खेल दिखाया। दर्शकों की भीड़ लग गई। सब खुश थे। उदास था तो बस तेजपाल। उसका खेल खत्म हो चुका था।
मिला वरदान।
सेवा राम एक गाँव में रहता था। घर में वह और पत्नी श्यामा, बस दो ही बच्चे थे। फिर भी जीवन आराम से नहीं बीत रहा था। सेवाराम के पास न जमीन थी, न कुछ और साधन। गाँव में जो छोटा-मोटा काम मिलता, उसी से जैसे-तैसे गुजर-बसर होती।
श्यामा रोज मन्दिर जाती, पति से कहती तो एक ही जवाब देता-‘‘तुम तो रोज मन्दिर में जाती हो! अब तक क्या मिल गया तुम्हें?’’ श्यामा हँसकर कहती-‘‘ मैं कुछ माँगने नहीं, भगवान की पूजा करने जाती हूँ। पूजा सच्ची होगी, तो कभी सफल भी हो जाऊँगी।’’ इस पर कभी-कभी सेवाराम भी श्यामा के साथ चला जाता।
दिन ऐसे ही बीत रहे थे। श्याम कहती थी-‘‘शहर जाकर कोशिश करो। शायद वहाँ कुछ काम मिल जाए। गाँव में बैठे-बैठे कुछ होने वाला नहीं है।’’ श्यामा ने जब कई बार कहा तो सेवाराम ने शहर जाने का मन बना लिया। एक सुबह निकल पड़ा। श्यामा ने हाथ जोड़कर मन में कहा-‘‘भगवान्, इनकी रक्षा करना।’’
चलते-चलते दोपहर हो गई। शहर अभी दूर था। श्यामा ने रास्ते के लिए दो रोटियाँ बाँध दी थीं। सेवाराम एक छायादार पेड़ के नीचे जा बैठा। चारों ओर सन्नाटा-झाड़ झंखाड़। थोड़ी दूर पर नदी बह रही थी।
सेवा राम ने खाने की पोटली खोली। फिर सोचा-‘पहले कहीं से पानी ले आऊँ।’ लोटा लेकर चला तो जमीन पर कुछ चमकता नजर आया। झुककर देखा, पीले रंग का सिक्का था। उसने उठा लिया। उलट-पलटकर देखता रहा। सोच रहा था-‘जाने किसका है? आस-पास कोई है भी नहीं जो पूछ लूँ।’ तभी श्यामा की बात ध्यान आई। लगा जैसे कह रही हो-‘साक्षात् लक्ष्मी है।’
सेवाराम चैंक पढ़ा। अरे हाँ! सच, ठीक ही तो है। दौड़ते कदमों से नदी तट पर पहुँचा। सिक्के को रगड़-रगड़ कर धोया, फिर लोटा भरकर पेड़ के नीचे चला आया। सिक्के को वहाँ पड़े एक पत्थर पर रख दिया। फिर सोचा, पूजा में तो फूल भी होते हैं। इधर-उधर देखा, सामने एक झाड़ी पर नन्हें-नन्हें फूल नजर आए। फूल लाकर सिक्के पर चढ़ा दिए। फिर आँखे मूँदकर हाथ जोड़ लिए।
अगले ही पल घोड़े की टापों का स्वर सुनाई दिया। एक घुड़सवार पेड़ के नीचे आकर रूका। वह भी छाया देखकर रूक गया था। घुड़सवार ने सेवाराम को यों बैठे देखा तो चैंका। पूछने लगा-‘‘इस समय किसकी पूजा कर रहे हो भाई! यहाँ तो कोई मन्दिर भी नहीं है। मैं तो यहाँ से अक्सर गुजरता हूँ। मेरा नाम सूरज है।’’
सेवाराम ने अपना परिचय दिया, पर पूरी घटना बता दी। सूरज ने बढ़िया कपड़े पहन रखे थे। उसे देखकर सेवाराम को अपने दीन-हीन वेश पर लज्जा आने लगी।
सेवाराम की बात सुन, सूरज ने हैरानी से देखा सोने का चमचमाता सिक्का और उस पर रखे फूल। उसने सिक्के को हाथ में उठा लिया, तभी सेवाराम की आवाज कान में पड़ी-‘‘अच्छा भैया, मैं चलूँ, अभी काफी रास्ता पार करना हैं।’’
सूरज ने सिक्के को फिर से वहीं रख दिया। एक बार मन में लालच ने सिर उठाया, फिर बोला-‘‘जानते हो यह क्या है?’’
‘‘क्या है?’’-सेवाराम ने पूछा।
-‘‘यह सोने का सिक्का है, कीमती और तुम उसे छोड़कर चले जा रहे हो।’’
‘‘तो और क्या करूँ! लक्ष्मी ने दर्शन दिए हैं। मेरी घरवाली कहती थी कि मैं पूजा नहीं करता। मैंने पूजा कर ली। अब शहर जाकर रोजगार ढूँढूंगा।’’-सेवाराम ने कहा।
सूरज अचरज से सेवाराम को देखता रहा- बोला-‘‘अगर सोने का सिक्का कोई और ले जाए तो?’’
‘‘उसकी वह जाने।‘‘-सेवाराम ने जवाब दिया और रास्ते की तरफ बढ़ा।
सूरज ने कुछ सोचा। बोला-‘‘मैं शहर जा रहा हूँ, मेरे साथ चलो। अकेले यहाँ भटकोगे?’’ सेवाराम ने एक-दो बार मना किया, पर सूरज ने उसे राजी कर लिया। सोने का सिक्का उसी तरह फूलांे के बीच पड़ा रहा। घोड़ा दोनों को लेकर चला गया।
सूरज शहर में मशहूर व्यापारी दीनदयाल का विश्वासपात्र कारिंदा था। उसने उन्हें सब कुछ बता दिया। दीनदयाल कुछ पल सेवाराम की ओर देखते रहे। उस भोले और ईमानदार आदमी ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। बोले-‘‘ सूरज, बस मुझे ऐसे ही आदमी की तलाश थी।’’
सेवाराम को नौकरी मिल गई। वह गाँव जाकर श्यामा को भी शहर ले आया। आते समय दोनों उसी पेड़ के नीचे रुके। वहाँ कुछ मुरझाए फूल पड़े थे, पर सोने का सिक्का नहीं था। सेवाराम ने वहाँ ताजे फूल चढ़ाते हुए कहा-‘‘लक्ष्मी माँ दर्शन देने आई थीं। वरदान देकर चली गई।’’ सुनकर श्यामा हँसने लगी। दोनों में इस बात पर कोई चर्चा नहीं हुई कि सिक्का कहाँ गया, उसे कौन ले गया होगा।
आग ने कहा
जामगढ़ के राजा थे रणवीर सिंह। बहुत योग्य और पराक्रमी। प्रजा के लिए प्राण देने को तैयार रहते थे। दुश्मन जब सामने आता तो काल बन जाते थे। उनका एक ही पुत्र था-आलोक सिंह।
जामगढ़ का पड़ोसी राज्य था बानागढ़। वहाँ का राजा महादेव सिंह था। वह समृद्ध जामगढ़ को अपने राज्य में मिला लेना चाहता था। उसने कई बार जामगढ़ पर आक्रमण किया, परन्तु रणवीर सिंह की वीरता के सामने उसकी एक न चली। आखिर महादेव ने निश्चय किया कि अगली बार पूरी तैयारी के साथ वह हमला करेगा।
महादेव ने चुपचाप अपनी सेना को संगठित किया। युद्ध की तैयारियाँ से संतुष्ट होने के बाद उसने जामगढ़ पर आक्रमण कर दिया। रणवीर सिंह को इतनी जल्दी फिर आक्रमण होने की आशंका न थी, परन्तु वह युद्ध के लिए तैयार हो गये। मोर्चें पर जाने से पहले उन्होंने मंत्री यशराज को बुलाया।
रणवीर सिंह ने देखा, मंत्री यशराज युद्ध में जाने के लिए तैयार होकर आया था। उसकी कमर पर तलवार बंधी थी।
‘‘यह क्या मंत्री जी, क्या तुम भी लड़ाई में जा रहे हो?’’-रणवीर सिंह ने पूछा।
‘‘जी महराज! इस बार मैं भी युद्ध के मैदान में अपना कत्र्तव्य पूरा करूँगा।’’-यशराज ने जोश में भरकर उत्तर दिया।
‘‘नहीं, नहीं, तुम्हें युद्ध में भेजने से महत्वपूर्ण काम है मेरे पास।’’-रणवीर सिंह बोले।
‘‘आज्ञा महाराज।’’-मंत्री यशराज ने आदर सहित कहा।
‘‘मैं युद्ध करने जा रहा हूँ। इस बार का युद्ध कोई भी मोड़ ले सकता है। अतः यहाँ की पूरी जिम्मेदारी तुम संभालो। तुम्हें राजकुमार आलोक का ध्यान रखना है।’’- रणवीर सिंह गंभीर स्वर में बोले।
-‘‘महाराज! आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? आप विजयी होकर लौटेंगे। यहाँ की आप जरा भी चिंता न करें।’’
‘‘पिता जी! आप मुझे भी आज्ञा दीजिए। मैं युद्ध में जाऊँगा।’’-तभी आलोक ने वहाँ आकर तलवार निकालते हुए कहा।
‘‘नहीं बेटा! मुझे विश्वास है, इस युद्ध को मैं अकेला ही जीत लूँगा। तुम्हारे लिए और बहुत से अवसर आयेंगे।’’-रणवीर सिंह ने मुसकराते हुए उत्तर दिया।
रणवीर सिंह सेना के साथ युद्ध भूमि में जा पहुँचा। भयंकर युद्ध छिड़ गया। बानागढ़ की सेना पूरी तरह तैयार होकर आई थी। अतः दोनों पक्षों मंे घमासान लड़ाई हुई, लेकिर रणवीर सिंह की वीरता के सामने महादेव की एक न चली। उसे मैदान छोड़कर भागने के लिए विवश होना पड़ा। रणवीर चाहते तो आगे बढ़कर बानागढ़ पर कब्जा कर लेते, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
युद्ध जीत कर रणवीर सिंह लौटे। वह बहुत घायल थे। क्योंकि सबसे आगे रहकर अपनी तलवार के जौहर दिखाये थे। राजवैद्य ने इलाज किया परन्तु कोई फायदा न हुआ। दूर-दूर से चिकित्सक बुलाये गये। धीरे-धीरे स्वास्थ्य बिगड़ता गया। अपना अंत निकट जान, उन्होंने मंत्री यशराज को बलाया। कहा-‘‘अब समय आ गया है कि आलोक को राजा बना दिया जाए। इसके राजतिलक की तैयारी की जाए।’’ राजा की बात सुन यशराज की आँखों में आँसू आ गये।
एक सादा समारोह हुआ। रणवीर ने अपने हाथों से आलोक का मुकुट पहनाया। सब अपने राजा का जय-जयकार करने लगे। लेकिन प्रजा उदास थी। इसके कुछ ही दिनों बाद रणवीर सिंह की मृत्यु हो गई। सारा राज्य शोक में डूब गया।
आलोक ने शासन व्यवस्था को ठीक से संभाल लिया। शुरू में सब ठीक चला, परन्तु जल्दी ही स्थितियाँ बदलने लगी। राज्य में उपद्रव होने लगे। लुटेरे राह चलते लोगों को लूट लेते। गाँवों पर डाकू हमला करते। लोगों को मारते। लूटकर घरों में आग लगा देते। लोगों ने इसकी शिकायत राजा से की। आलोक ने सैनिकों को भेजा, परन्तु वारदातें नहीं रुकीं। हर जगह से ऐसे ही समाचार आ रहे थे।
एक रात आलोक महल की छत पर टहल रहे थे। उन्हें नींद नहीं आ रही थी। वह राज्य में होने वाले उपद्रवों की उलझन में उलझे हुए थे। समझ में नहीं आ रहा था कि स्थिति पर कैसे काबू पाया जाये। अचानक महल से दूर आग की लपटें उठती दिखाई दीं। थोड़ी देर बाद लपटें बुझ गई। आलोक का ध्यान उधर गया। उन्होंने देखा कई बार लपटें उठीं और फिर तुरन्त बुझ भी गई।
लपटों का रहस्य आलोक की समझ में नहीं आया। उन्होने सेनापति राजेन्द्र सिंह को बताया कहा-‘‘ सामने कई बार लपटें उठीं और बुझ गईं। इसका क्या मतलब हुआ? पता करो।’’
‘‘जी महाराज! मैं स्वयं जाता हूँ।’’- कहकर राजेन्द्र सिंह चल दिया।
सुबह सेनापति फिर आया। उसने रात वाली घटना के बारे में कहा-‘‘महाराज! मैं स्वयं पता करने गया था। कहीं कुछ नहीं था। शायद कहीं कोई यात्री दल टिका हो। उन्होंने ही आग जलाई होगी। कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है।’’ आलोक इस बात से संतुष्ट हो गए।
थोड़ी देर बाद मंत्री यशराज आया। उसने कहा-‘‘महाराज! आज मैं आपको एक अनोखी जगह ले जाना चाहता हूँ।’’
‘‘कहाँ चलना है?’’- आलोक ने पूछा।
‘‘महाराज, यह न पूछें! मैं वहीं चलकर बताऊँगा।’’-यशराज ने हाथ जोड़कर कहा। आलोक को यशराज पर पूरा भरोसा था। वह यशराज चल पड़े अपने सैनिक भी साथ थे।
यशराज राजा आलोक को एक ऊँचे टीले पर ले गया। वहाँ बुझी हुई लकड़ियाँ पड़ी थीं। आलोक की समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने यशराज की तरफ देखा। मंत्री ने गंभीर स्वर में कहा- ‘‘महाराज! यहीं रात को लपटें उठी थीं। ये बुझी हुई लकड़ियाँ हमारे राज्य को जला सकती हैं।’’
आलोक ने आश्चर्य से पूछा-‘‘ये लकड़ियाँ हमारे राज्य को कैसे जला सकती हैं! यहाँ आग किसने जलाई? यहाँ तो आप-पास कोई रहता भी नहीं है।’’
‘‘आप मेरे साथ चलिए महराज! मैंने राज्य के शत्रुओं को कैद कर रखा है। आपको सब कुछ पता चल जायेगा।’’-मंत्री ने जवाब दिया। वह राजा को लेकर एक गुप्त स्थान पर पहुँचा। वहाँ कुछ लोगों को सैनिकों ने बंदी बना रखा था। मंत्री ने कहा-‘‘महाराज, यही हैं वे लोग जो आग जलाकर महल में संकेत दे रहे थे। मैंने किले से भी ऐसे संकेत देखे थे। इसीलिए खोज करने आया था।’’
आलोक ने पूछा-‘‘यह बात तुम महल में भी बता सकते थे।’’
‘‘महाराज! वहाँ बताना तो दुश्मन सावधान हो जाता है।’’ यशराज ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया।
गुस्से से आलोक की आँखें लाल हो गयी। उन्होंने क्रोधित होकर कैदियों से पूछा-‘‘सच-सच बताओं। तुम्हें किसने भेजा है यहाँ? आग जलाकर किले में किसे संदेश दे रहे थे? बताओ, नहीं तो अभी मृत्युदण्ड देता हूँ।’’
कैदी घबरा गये। उन्होंने जान बचाने के लिए सच बोल दिया-‘‘महाराज! हमें क्षमा करें। हम बानागढ़ के गुप्तचर हैं। यहाँ हमें उप्रदव फैलाने के लिए भेजा गया था। हमारे राजा की योजना है कि यहाँ प्रजा में विद्रोह के बीज बो दें। जब प्रजा विद्रोह कर देगी, तब वह आक्रमण कर देंगे। आपके राज्य के कुछ बड़े अधिकारी हमारी सहायता कर रहे हैं। उनका नेता है- सेनापति राजेन्द्र सिंह।’’
‘‘क्या.........! राजेन्द्र सिंह?’’-आलोक को अपने कानों पर भरोसा न हुआ।
‘‘जी महाराज! इसीलिए मैं आपको यहाँ लेकर आया था।’’-यशराज ने गंभीर स्वर में कहा।
‘‘लेकिन राजेन्द्र सिंह ने ऐसा क्यों किया?’’-आलोक ने पूछा, जैसे उन्हें अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था।
‘‘हमारे महाराज ने आपके सेनापति से वादा किया है कि उन्हें ही आपके बाद.......’’
‘‘खामोश!’’-आलोक गरजकर बोेले। शत्रु गुप्तचर अपनी बात पूरी न कर सका। आलोक सिंह सन्न रह गए। फिर अपने आपको संभाला। मंत्री के साथ महल वापस पहुँचे। राजेन्द्र सिंह को तुरन्त गिरफ्तार कर लिया गया। भांड़ा फूटता देख उसने और देश द्रोहियों के भी नाम बता दिये। सबको पहड़कर कारागार में डाल दिया गया।
आलोक सिंह ने रात को एक गुप्त बैठक बुलाई। उन्होंने राजेन्द सिंह की गद्दारी के विषय में बताया। फिर बोले-‘‘जब तक बानागढ़ में महादेव सिंह का शासन हैं, युद्ध होते रहेंगे। षड्यंत्र चलते रहेंगे। आज तक उसने हम पर आक्रमण किया है। हम केवल बचाव करते रहे हैं। इस बार आक्रमण हम करेंगे।
‘‘हम सब आपके साथ हैं।’’ सारे दरबारी एक स्वर में बोले।
‘‘ठीक है! मंत्री जी, आप सेना को तैयार होने का आदेश दीजिए। इस बार मैं स्वयं आगे रहकर सेना का नेतृत्व करूँगा।’’-आलोक सिंह दृढ़ स्वर में बोले।
रातोें-रात सेना तैयार करके आलोक सिंह ने बानागढ़ पर आक्रमण कर दिया। महादेव सिंह तो षड्यंत्र रचकर ही प्रसन्न हो रहा था। उसने यह कल्पना भी नहीं की थी कि आलोक पलटकर आक्रमण कर देगा। वह आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार न था। बानागढ़ की सेना युद्ध में टिक न सकी। लड़ते-लड़ते महादेव सिंह मारा गया। बानागढ़ को आलोक ने अपने राज्य में मिला लिया।
चलो काशी
दीपक ब्रम्हचारी था। उसने शस्त्रों में पढ़ा था, शिष्य के लिए सबसे बड़े देवता उसके गुरु होते हैं। इसी भाव को मन में रखकर दीपक अपने गुरु का आदेश का पालन करता था। उसकी सेवा में लगा रहता था।
दीपक के गुरू थे वेदधर्मा। उसका आश्रम गोदावरी के तट पर स्थित था। वेदधर्मा विद्वान थे। दूर-दूर से छात्र उनके आश्रम में पढ़ने आते थे अपने सभी शिष्यों के लिए वेदधर्मा के मन में स्नेह भाव रहता था। वह लगन से सबको शिक्षा-दीक्षा देते थे। उनके आश्रम का वातावरण एक बड़े परिवार जैसा था और गुरु वेदधर्मा उस विशाल परिवार के मुखिया थे।
सब शिष्यों में दीपक वेदधर्मा की अधिक सेवा करता था। शिक्षा में भी वह सबसे आगे रहता था। इस कारण वेदधर्मा उस पर विशेष स्नेह रखते थे।
एक दिन वेदधर्मा ने दीपक को बुलाया, वह तुरन्त आया। उसने हाथ जोड़कर कहा-‘‘क्या आज्ञा है गुरूदेव?’’ वेदधर्मा ने एक बार इधर-उधर देखा, फिर बोले-‘‘मेरे साथ नदी के तट पर चलो। एकान्त में तुमसे एक विशेष बात करनी है।’’
दीपक ने गुरु वेदधर्मा की ओर देखा। मन में आशंका ने सिर उठाया। सोचने लगा-‘ऐसी क्या विशेष बात है जिसे गुरूदेव एकान्त में कहना चाहते हैं।’
दीपक गुरु जी के पीछे-पीछे नदी तट पर जा पहुँचा। आसपास कोई नहीं था। वेदधर्मा ने कहा- ‘‘जो बात मैं तुमसे कहने जा रहा हूँ, उसे कोई नहीं जानता और मैं तुम्हारे अतिरिक्त किसी दूसरे से कहूँगा भी नहीं। ध्यान से सुनो।
मैं पूर्व जन्मों के अनेक पापों का प्रायश्चित इस जन्म में कर चुका हूँ। केवल दो का प्रायश्चित करना शेष है। मैं इसके लिए वाराणसी जाना चाहता हूँ, क्योंकि वह महापावन है। वहाँ पाप नष्ट होते हैं, पुण्य बढ़ता है।’’
दीपक ध्यान से अपने गुरु की बात सुन रहा था उन्होंने आगे कहा-‘‘मैं पूर्व जन्मों के पापों के लिए प्रायश्चित करूँगा। उससे पहले मेरे शरीर में अनेक विकार पैदा हो जायेंगे। शरीर गलने लगेगा, नेत्रों की ज्योति जाती रहेगी। उस कारण मेरे स्वभाव में भी परिवर्तन आ जाएगा। हो सकता है, मैं ऐसा व्यवहार करने लगूँ, जिसकी आज तुम कल्पना भी न कर सको। क्या उस स्थिति में भी तुम मेरी देखभाल कर सकोगे?’’
दीपक गुरु भक्त था। उसने तुरन्त उत्तर दिया-‘‘गुरूदेव, मैं नहीं जानता, पूर्व जन्म मेें आपने क्या किया था। इस जन्म में आप मेरे परम आदरणीय गुरूदेव हैं। मैं आपके लिए सब कुछ कर सकता हूँ। पर यह प्रायश्चित आप मुझे करने दीजिए।’’
शिष्य की गुरू भक्ति देख कर वेदधर्मा प्रसन्न हुए। मुसकराते हुए बोले-‘‘वत्स, पाप जिसने किये हों, प्रायश्चित भी उसी को करना होगा, तभी पापों से मुक्ति मिलेगी। जैसा मैं कहता हूँ, वैसा करने का वचन दो तो मैं निश्चिन्त हो जाऊँ।’’
गुरु-सेवा दीपक को प्रिय थी। उसने कहा-‘‘ गुरु जी आप जरा भी चिन्ता न करें। चाहे जैसी भी परिस्थित आए, मैं आपकी सेवा से मुँह नहीं मोडूँगा, वचन देता हूँ।’’
गुरु वेदधर्मा ने और किसी से कुछ न कहा। आश्रम का भार कुछ शिष्यों पर छोड़कर वह काशी के लिए चल दिये। दीपक तो छाया की तरह उनके साथ था ही।
काशी में वेदधर्मा मणिकर्णिका के निकट ठहर गए। उन्होंने बाबा विश्वनाथ और मामा अन्नपूर्णा की पूजा करने के बाद पूर्व जन्म के पापों का आहवाहन किया। पूर्व जन्म के पापों के प्रभाव से तन-मन में परिवर्तन आने लगा। देह पर बड़े-बड़े घाव दिखाई देने लगे। असहय पीड़ा रहने लगी। नेत्र की ज्योति चली गयी।
वेदधर्मा के लिए पूरा संसार अंधकारमय हो गया। शरीर में विकार के साथ-साथ स्वभाव में भी परिवर्तन आ गया। अपने शिष्य के प्रति सहज अनुराग खत्म हो गया। वह उस पर हर पल क्रोध करने लगे। दीपक जितने मनोयोग से रोगी गुरु जी की सेवा करता, वह उतनी ही उग्रता से उसे फटकारते, गालियाँ देते।
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दीपक को वेदधर्मा ने पहले ही इस परिवर्तन के बारे में सब कुछ बता दिया था, फिर भी गुरु जी की दशा देखकर उसका मन काँप उठा। वह गालियों की परवाह न कर, हर क्षण उनकी सेवा में लगा रहता। इसी तरह समय बीतने लगा। दीपक की अटल गुरु भक्ति देखकर बाबा विश्वनाथ उस पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने दीपक को साक्षात् दर्शन दिये, कहा-‘‘ तुम जैसी गुरु-भक्ति दुर्लभ है। वर माँगो।’’
दीपक ने कुछ सोचा, फिर बोला-‘‘मैं अपने गुरुदेव से पूछकर आपको बता सकता हूँ।‘‘ उसने वेदधर्मा से कहा-‘‘कहिए तो आपके पाप-शमन का वर माँग लूँ।’’ उसने वेदधर्मा से कहा-पर उन्होंने मना कर दिया। कहा-‘‘पाप तो भोगने से ही मिटते हैं।’’
दीपक बाबा विश्वनाथ के सामने नतमस्तक हो गया-‘‘भगवन, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं अटल मन से गुरु जी की सेवा करना चाहता हूँ।’’ यह सुन भगवान शिव अंतध्र्यान हो गए। कुछ देर बाद ब्रम्हा, विष्णु के साथ उसके सामने प्रकट हो गये। त्रिमूर्ति ने एक स्वर में कहा-‘‘वत्स, तेरी भक्ति अमूल्य है। हम प्रसन्न हैं। वर माँग।’’
दीपक अब मन में पक्का निश्चय कर चुका था। उसने तुरन्त कहा-‘‘ यदि आप मुझे देना ही चाहते हैं, तो अटल गुरु भक्ति का वरदान दीजिए। चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, मेरा मन उनकी सेवा से विमुख न हो।’’
‘‘तथास्तु।’’-कहकर ब्रम्हा, विष्णु, महेश अंतध्र्यान हो गए। दीपक फिर से गुरु की सेवा में जुट गया।
अपनी खोज
एक राजा थे दुलार सिंह। नाम के अनुरूप प्रजा से स्नेह करने वाले। प्रजा भी अपने राजा को चाहती थी।
एक बार एक महात्मा जी शिष्य मंडली के साथ राजधानी में आए। दलार सिंह ने सबके रहने की उत्तम व्यवस्था कर दी। एक दिन मंडली सहित महात्मा जी को राजमहल में आमंात्रित किया। महात्मा जी पधारे। दुलार सिंह ने परिवार सहित महात्मा जी की चरण धूलि ली। उन्होंने राज परिवार को आशीर्वाद दिया।
दुलार सिंह ने कहा-‘‘ महात्मा जी, मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है। मैं उसका समाधान चाहता हूूँ।’’ महात्मा जी के पूछने पर राजा ने कहा-‘‘राजधानी में एक भव्य मन्दिर है। मैं सपरिवार वहाँ रोज दर्शन-पूजन के लिए जाता हूँ। हमारे राज्य की प्रजा में भी भरपूर भक्ति भाव है। फिर भी मै। यह नहीं जान पाया कि भगवान का सच्चा भक्त कौन है?’’
दुलार सिंह की बात सुन महात्मा जी हँसकर बोले-‘‘यह जानना कठिन नहीं है। मेरे पास पवित्र हवन सामग्री है। यह तुरन्त प्रज्वलित हो उठती है, लेकिन ऐसा उसी स्थिति में होता है जब कोई सच्चा व्यक्ति उसे हाथ में ले। तुम एक यज्ञ का आयोजन करवाओ।’’
महात्मा जी की बात सुन, राजा कुछ सोच में पड़ गये। महात्मा जी ने कहा-‘‘शायद तुम यह सोच रहे हो, इस तरह तो किसी का हाथ जल सकता है। तो इसका उपाय यही है कि लोग लोहे के छोटे-छोटे पात्र लेकर आएँ। मैं हर पात्र में अपने हाथ से थोड़ी सी पवित्र हवन सामग्री डाल दूँगा। बस, जो सच्चा भक्त होगा, उसके पात्र में हवन सामग्री अपने आप प्रज्वलित हो जाएगी।’’
दुलार सिंह ने घोषणा करा दी। प्रजाजन हाथों में छोटे-छोटे पात्र लेकर राजमहल के सामने वाले मैदान में इकट्ठा हो गये। महात्माजी एक व्यक्ति को बुलाये और उसके पात्र में चुटकी भर हवन सामग्री डाल देते। काफी समय तक यही क्रम चलता रहा। दुलार सिंह तथा राज परिवार के अन्य सदस्य भी महात्मा जी के इस प्रयोग में शामिल हुए। कुछ देर के बाद महात्मा जी ने कहा-‘‘ दुलार सिंह, अभी तक प्रयोग सफल नहीं हुआ है। सच्चा भक्त सामने नहीं आया है।’’
यह देखकर दुलार सिंह का मन अशांत हो गया। उसने कहा-‘‘महात्मा जी, इसका अर्थ तो यही हुआ कि मैं और मेरे परिवार के सदस्य भी सच्चे भक्त नहीं है।’’ महात्मा जी ने कहा-‘‘ अभी बहुत से लोग रह गए है। आओ, हम उनके पास चलें।’’ इसके बाद महात्मा जी के साथ दुलार सिंह एक रथ में बैठे। रथ चलने लगा। जहाँ रथ रुकता, भीड़ जमा हो जाती। महात्मा जी हर व्यक्ति के पात्र में वही हवन सामग्री डाल देते।
इसी समय एक बूढ़ा महात्मा जी के पास आया। महात्मा जी ने उसके पात्र में जैसे ही हवन सामग्री डाली, वह एकदम प्रज्वलित हो उठी। दुलार सिंह ने देखा, बूढ़ा दीन-हीन वेश में था। तो क्या यह सच्चा भक्त है?- राजा के मन में आया। वह चकित थे। उन्हें विचार मग्न देख, महात्मा जी हँस पड़े। उन्होंने बूढ़े से उसके परिवार के बारे में पूछा।
बूढ़े ने बताया-‘‘मैं साधारण आदमी हूँ। कुटिया में बैठकर सूत कातता हूँ। बस, इसी बीच भगवान का नाम जपा करता हूँ। घर में और कोई नहीं है। पत्नी बहुत दिन हुए स्वर्ग सिधार गई। बेटी का विवाह हो गया है। सूत बेचने से जो कुछ मिलता है, उसी से गुजारा चलता है। मैं नहीं जानता कि भक्ति किसे कहते हैं, सच्चा भक्त कौन होता है?’’
महात्मा जी और राजा दुलार सिंह वहाँ से यज्ञ स्थल की ओर गए। साथ में वह बूढ़ा भी था जिसके पात्र में डालते ही हवन सामग्री अपने आप प्रज्वलित हो गई थी। वह बेचारा हैरान था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि सब उसे इतने सम्मान से क्यों देख रहे हैं।
यज्ञ में दूर-दूर से संत महात्मा आए थे। यज्ञ समाप्त होने के बाद दुलार सिंह ने एक बड़ा भोज दिया। वह महात्मा जी के आदेश का पालन करता जा रहा था, पर मन में उलझन थी-‘ मैं राजा हूँ, फिर भी सबसे बड़ा भक्त नहीं बन सका।’ आयोजन संपन्न हुआ तो महात्मा जी ने जाने की इच्छा प्र्रकट की। दुलार सिंह ने कहा-‘‘मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ। मैं चाहता हूँ, यह बूढ़े बाबा कुछ दिन राज महल में रहें। शायद मैं भी इनसे सच्ची भक्ति का रहस्य जान सकूँ।’’
राजा की बात सुनकर महात्मा जी हँस पड़े। उन्होंने बूढ़े की ओर देखा। वह बोला-‘‘मैं जिस कुटिया में रहता हूँ, वहीं ठीक हूँ। आखिर मैं राजमहल में क्यों रहूँ? मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए।’’
महात्मा जी के कहने पर राजा ने बूढ़े बाबा को जाने की अनुमति दे दी। महात्मा जी ने कहा-‘‘दुलार सिंह, यह चिंता छोड़ो कि सबसे बड़ा भक्त कौन है? बस अपना कर्म करते रहो। न्याय से शासन चलाओ, सच्चे मन से ईश्वर का नाम लो। तुमने देखा, सच्चा भक्त ढूँढ़ने की चिंता में कितना समय व्यर्थ हो गया।’’
‘‘आप ठीक कह रहे है!’’-दुलार सिंह ने कहा। वह महात्मा जी की बात का मर्म समझ गया था।
डिबिया में कौन
राज महल उदास था। स्वर्णपुरी की रानी रात-दिन आँसू बहाती थी। राजा भी बहुत दुखी थे। अभी तक रानी की गोद नहीं भरी थी। इसी तरह काफी समय बीत गया। रानी से कष्ट सहन न हुआ, तो एक दिन वह महल के जलाशय में डूबने चली गयी।
रानी ने पानी में डुबकी लगाई। तभी एक लता उसके हाथ से लिपट गई। फिर एक आवाज सुनाई दी-‘महल वापस चली जाओ। इस लता को पीसकर खा लेना। ठीक समय पर पुत्र होगा।’
भविष्यवाणी सुन, रानी प्रसन्न हो गई। जलाशय से निकली तो हाथ में लता थी। राजा को बताया। लता को पीसकर खा लिया। राजा ने अन्न-वस्त्र के भण्डार खोल दिए। चारों ओर उत्सव का वातावरण छा गया।
स्वर्णपुरी के दक्षिण में बरगद का विशाल वृक्ष था।
वहाँ एक तांत्रिक ने धूनी रमा दी। उसकी उम्र कितनी थी, कोई नहीं जानता था। दिन में किसी ने उसे आँखें खोलते नहीं देखा था। लोग कहते थे, वह रात के अंधेरे में घूमता था। बच्चों को उठाकर जाने कहाँ से लाता था। उसके डर से हर माँ अपने बच्चे को संभाल कर रखती थी।
स्वर्णपुरी की रानी ने बेटे को जन्म दिया। उस समय भी रात थी। रानी की नींद आ गई। कुछ क्षणों के लिए ऐसा हुआ कि रानी के कक्ष में कोई न रहा। तांत्रिक तो इसी मौके की ताक में था। वह माया से महल में घुस आया।
उसने राज कुमार को उठाया और लोप हो गया। कोई कुछ न जान सका। बरगद के नीचे जा पहुँचा। तांत्रिक ने पेड़ के कोटर से एक डिबिया निकाली। फिर हाथ हिलाया तो शिशु एक भौंरा बन गया। तांत्रिक ने भौंरा बने शिशु को डिबिया में बंद किया, फिर डिबिया कोटर में रख दी। इसी बरगद पर तोता-मैना रहते थे। दोेनों जाग रहे थे। उन्होंने तांत्रिक की करतूत देख ली।
उधर स्वर्णपुरी के महल में हाहाकार मच गया। पुत्र जन्म की खुशी गहरे दुःख में बदल गई। कोई नहीं जान सका कि नन्हा राज कुमार कहाँ गायब हो गया। रानी तो दुःख से अचेत हो गई।
राजा क्रोधित थे। उन्हें लगा यह एक षड्यंत्र है। इसमें रानी स्वयं भी शामिल है। राजा ने रानी को महल से निकाल दिया। कहा-‘‘मेरे बेटे को न ढूँढ़ सको तो वापस मत आना।’’ बेचारी रानी! उसका कोई दोष नहीं था। पर राजा का आदेश ठहरा। वह रोती बिलखती महल से निकल गई।
रानी ने घने जंगल में आश्रय लिया। धरती का बिछौना और पत्तों की छत। अब कंद-मूल ही उसका भोजन था। पुत्र के वियोग में वह रोती रहती थी। अनेक वर्ष इसी तरह बीत गए।
वन के दूसरी ओर था रूपनगर। वहाँ की रानी ने एक कन्या को जन्म दिया। वह अमावस्या की रात थी। रानी को नींद आ गई, तो वही तांत्रिक अदृश्य होकर उसके कक्ष में आ गया। उसने नवजात कन्या को उठाया और बाहर निकल गया।
बाहर आकर देखा तो अपनी गलती पता चली। तांत्रिक को अपनी साधना के लिए लड़की नहीं, लड़का चाहिए था। उसने राज कन्या को एक वन में एक पेड़ के नीचे छोड़ दिया और आगे चला गया। उस दुष्ट को जरा भी पछतावा नहीं था कि उसने बिना बात क्या कर्म कर डाला था।
संयोग से स्वर्णपुरी की रानी की कुटिया पास में थी। उसने नवजात बच्ची का रोना सुना, तो बाहर निकली। कन्या को उठाकर हृदय से लगा लिया। अपना दुःख कुछ कम हुआ। वह सोच रही थी-‘कौन छोड़ गया इसे?’
स्वर्णपुरी की रानी की गोद में रूप नगर की राज कन्या का बचपन बीता। उसका नाम रानी ने रखा रूपमाला। राजकन्या रानी को माँ कहकर पुकारती और वन के हिरनों के साथ चैकड़ी भरती। रूपमाला को पल भर न देखती तो रानी व्याकुल हो उठती। रूपमाला को पाकर वह अपना दुःख कुछ भूल गई थी। पर कभी-कभी पुरानी बातें याद करके उसकी आँखें झर-झर आँसू बरसातीं।
राजा ने उसकी बात का जरा भी विश्वास नहीं किया था। उसे महल से भिखारिन की तरह निकाल दिया। पर इसका रानी को इतना दुःख नहीं था। दुःख तो इस बात का कि ईश्वर ने यदि पुत्र दिया, तो उसे इस प्रकार छीन क्यों लिया?
एक रात रूपमाला रानी के पास लेटी थी। रोने की आवाज से उसकी नींद टूट गई।
वह बोली-‘‘माँ, तुम क्यांे रो रही हो?’’ और फिर स्वयं भी रोने लगी। पहले रानी ने बहुत टाल-मटोल की, पर रूपमाला की जिद के आगे उसकी एक न चली। हारकर उसने अपनी आप बीती रूपमाला को कह सुनाई। कहते-कहते रानी की हिचकी बँध गई।
सारी बातें सुन रूपमाला हैरान रह गई। फिर दृढ़ स्वर में बोली-‘‘माँ, तुमने मुझे पहले ये बातें क्यों नहीं बताईं? मैं आज ही राज कुमार को ढूँढ़ने निकलती हूँ।’’
रानी ने कितना मनाया, पर रूपमाला अपनी बात पर अड़ी रही। एक दिन ऋषि कुमार का वेश बना, कमर में तलवार बाँध, निकल पड़ी। राज कुमार को खोजने। रानी रोकती ही रह गई कहीं पुत्र की तरह यह भी न खो जाए।
रूपमाला चली नदी-नाले पारकर राज कुमार को खोजने।
आखिर थककर उसी बरगद के नीचे बैठ गई। बैठी तो वहीं सो गई। अचानक पक्षियों के कलरव से उसकी नींद टूट गई। देखा, एक विशाल अजगर उस बरगद पर चढ़ रहा है। उसे चढ़ते देख, घोंसलों में बैठे बच्चे चीं-चीं कर चिल्ला रहे हैं। उसी क्षण रूपमाला का हाथ तलवार पर गया। तलवार के एक वार से उसने अजगर को समाप्त कर दिया।
शाम को चुग्गा लेकर तोता-मैंना घोंसले के करीब आए। मैना बोली-‘‘आज बच्चों का शोर नहीं सुनाई पड़ रहा है।’’ चिंतित हो, वे घोंसले के भीतर पहुँचे। बच्चे बोले-‘‘इस पेड़ के नीचे तो संुदर कुमार सोया है, उसने आज हमारे प्राण बचाए।’’
तोता बोला-‘‘धन्य है यह कुमार। यदि मैं इस कुमार के किसी काम आ सकूँ, तो अपने को धन्य समूझँगा।’’
रूपमाला गहरी नींद में थी। एकाएक लगा जैसे कोई पुकार रहा हो। आँखें खोलते ही देखा, तोता मैना का जोड़ा सामने है। तोता मनुष्य स्वर में बोला-‘‘तुमने आज अजगर को मारकर हम पक्षियों पर बहुत उपकार किया है। इसके बदले में हम भी कुछ करना चाहते हैं।’’
रूपमाला ने अपने इस तरह घूमने का कारण बताया। वह बोली-‘‘मैंने प्रतिज्ञा की है। जैसे भी होगा, स्वर्णपुरी के राजकुमार के खोजकर अपने साथ ले जाऊँगी।’’
तोता बोला-‘‘यह एक तांत्रिक की करतूत है। वही चूरा लाया था कुमार को। आज रात वह पर्वत की गुफा में कुमार की बलि देगा। तुम चाहो, तो हम तुम्हें वहाँ तक ले चलें इससे पहले वह राजकुमार को मनुष्य रूप में लाएगा।’’
तोता-मैना, रूपमाला को पर्वत पर ले गए। रास्तें में उन्होंने तांत्रिक के बारे में उसे सब कुछ बता दिया।
गुफा में तांत्रिक मौजूद था। वह सचमुच बलि की तैयारी कर रहा था। रूपमाला चट्टान के पीछे छिपकर देखती रही। उसका हाथ अपनी तलवार की मूठ पर ही था।
देखते-देखते तांत्रिक ने डिबिया में कैद राजकुमार को मनुष्य रूप में बदल दिया। वह उसकी बलि देने की तैयारी में जुट गया। भौंरे को मनुष्य बनते देख रूपमाला चकित रह गई। उसे तांत्रिक की शक्ति से कुछ डर भी लगा, पर फिर उसने अपने को संभाला।
तांत्रिक आँखें बन्द कर मंत्र पढ़ रहा था। तभी रूपमाला ने तलवार चला दी। तांत्रिक वहीं ढेर हो गया। उसका कोई तंत्र-मंत्र काम न आया। तांत्रिक के मरते ही उसका जादू नष्ट हो गया।
तोता, मैना सबको रास्ता दिखाते हुए पर्वत से नीचे आए। रूपमाला ने स्वर्णपुरी के कुमार को बताया कि तांत्रिक ने क्या किया था। तभी तोते ने रूपमाला को उसके अपने जीवन की घटना भी बता दी।
दुष्ट तांत्रिक के कारण राज कुमार को ही नहीं, उसे स्वयं भी अपने परिवार से बिछुड़ना पड़ा था, यह जानकर रूपमाला फूट-फूटकर रो पड़ी। स्वर्णपुरी के राजकुमार ने उसे दिलास दी। कहा-‘‘ तुम्हारे कारण ही तांत्रिक का नाश हुआ है। अब कैसा भय!’’
सब मिलकर स्वर्णपुरी की रानी के पास पहुँचे। वह रूपमाला के साथ एक युवक को देखकर हैरान रह गई। रूपमाला ने राजकुमार को संकेत किया। वह माँ-माँ कहता हुआ रानी से लिपट गया। फिर तोते ने पूरी घटना रानी को कह सुनाई।
राज कुमार रूपमाला को उसके नगर में छोड़ने गया। फिर अपनी माँ को लेकर स्वर्णपुरी पहुँचा। सारी घटना जानकर स्वर्णपुरी के राजा गहरे अचरज से बेटे को देखते रह गए।
उन्होंने रानी से क्षमा माँगी। फिर बोले-‘‘राजकुमार पर रूपमाला का ही अधिकार है। उन दोनों का विवाह तुरन्त होना चाहिए।’’ सुनकर रानी ने कहा-‘‘अगर रूपमाला न होती, तो हमारे सुख के दिन कभी न लौटते।’’
एक दिन शुभ मुहूर्त में स्वर्णपुरी के राजकुमार और रूपमाला का विवाह सम्पन्न हुआ। मेहमानों के बीच तोता-मैना भाी उपस्थित थे। उन दोनों ने ही तो रूपमाला को तांत्रिक के विनाश का तरीका बताया था।
‘‘एक दिन बिक जायेगा, माटी के मोल,
जग में रह जायेंगे, प्यारे तेरे बोल।
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत,
कोई निशानी छोड़, फिर दुनियाँ से डोल।’’
आशा करता हूँ कि आप लोगों का अपार स्नेह व सहयोग मुझे हमेशा मिलता रहेगा।