बुधवार, 27 जनवरी 2021

Hindi Story to read online-कहानियाँ आनलाइन पढ़ने के लिए

Hindi Story to read online|Story Read in Hindi-कहानियाँ आनलाइन पढ़ने के लिए

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 दो सगे भाई

                 एक वृक्ष पर एक ही माँ से पैदा हुए दो तोते रहते थे। दोनों रूप, रंग में एक समान दिखाई पड़ते थे। उद्यपि दोनों के नाम पृथक-पृथक थे, पर रूप और रंग में समान होने के कारण उन्हें पहचानने में अधिक कठिनाई होती थी।

                 एक बार इतने जोर से आँधी आई कि वृक्ष की जड़ें तक हिल गई। ऐसा लगने लगा कि वृक्ष उखड़कर गिर पड़ेगा। दोनों तोते व्याकुल हो उठे। आँधी में उड़ पड़े। आँधी के कारण दोनों एक-दूसरे से बिछुड़ गए। एक तो चोरों की बस्ती में जाकर गिरा और दूसरा पहाड़ के नीचे ऋषियों के आश्रम में जाकर गिरा। जो चोरों की बस्ती में गिरा था, वह तो चोरों की बस्ती में रहने लगा और जो ऋषियों के आश्रम में जा गिरा था वह ऋषियों के आश्रम में रहने लगा। दोनों को एक-दूसरे का पता ठिकाना ज्ञात था।

                 धीरे-धीरे कई वर्ष बीत गए। एक दिन वाराणसी का राजा रथ पर सवार होकर शिकार के लिए निकला। जब वह थक गया तो चोरों की बस्ती के पास एक सरोवर के किनारे जाकर आराम करने लगा। वहाँ कोई नहीं था। केवल इधर-उधर कुछ वृक्ष खड़े थे। राजा की नींद सी आ रही थी किन्तु किसी की कर्कश आवाज सुनकर उसकी नींद टूट गई। वह कर्कश आवाज एक तोते की थी जो एक वृक्ष की डाल से बोल रहा था। राजा बड़े ध्यान से तोते की आवाज सुनने लगा। वह मनुष्य के समान ही बोल रहा था। अरे कोई है इस आदमी के पास बहुत सा धन है। यह गले में मोतियों और हीरों की माला पहने हुए है। यह सोया हुआ है। इसकी गर्दन दबाकर मोतियों की माला निकाल लो और लाश को झाड़ी में गाड़ दो। किसी को पता नहीं चल सकेगा।

                 तोते को मनुष्य की तरह बोलते देखकर राजा डर गया। वह उठकर बैठ गया और मन ही मन सोचने लगा कि यह जगह तो बड़ी डरावनी है क्योंकि यहाँ तोता भी मनुष्य की तरह बोलता है और जान से मार डालने की बात करता है। अतः यहाँ से चल देना ही ठीक होगा। राजा उठा और अपने रथ पर बैठकर आगे की ओर चल पड़ा। रथ जब चलने लगा तो तोता पुनः कर्कश आवाज में बोला- ‘‘अरे कोई है, यह तो भाग रहा है। इसे पकड़ लो।  इसके गले में मोतियों और हीरों की माला है। इसकी हत्या करके गले से मोतियों और हीरो की माला निकाल लो।’’

                 राजा ने तोते की इस आवाज को भी सुना। उसके मन का डर और भी अधिक बढ़ गया। वह तेजी के साथ घोड़ों को दौड़ाता हुआ दूर तक निकल गया। राजा रथ को दौड़ाता हुआ पर्वत के नीचे ऋषियों के आश्रम में गया। किन्तु आश्रम मेें सन्नाटा छाया हुआ था। सभी ऋषि और मुनि भिक्षाटन के लिए बाहर गए हुए थे। रथ से उतरकर राजा चकित विस्मित दृष्टि से इधर-उधर देखने लगा। अभी वह देख ही रहा था कि किसी की कोमल आवाज उसके कानों में पड़ी। वह आवाज एक तोते की थी जो वृक्ष की डाल पर बैठा हुआ था। 

                    तोता राजा को देखकर कह रहा था- ‘‘आइए राजन्! बैठिए सभी ऋषि और मुनि भिक्षाटन के लिए गए हैं।’’ आश्रम में शीतल जल मौजूद है। प्यास लगी हो तो ठण्डा पानी पीजिए और यदि भूख लगी हो तो फल खाइए। आश्रम में फल भी मौजूद हैं।

राजा चकित दृष्टि से वृक्ष की डाल पर बैठे तोते को देखने लगा। तोते का रंग रूप बिलकुल वैसा ही था जैसा चोरों की बस्ती के पास रहने वाले तोते का था। राजा तोते की ओर देख रहा था कि तोता पुनः बोल उठा- ‘राजन्! निश्चिंत होकर आराम कीजिए। यह ऋषियों का आश्रम है। यहाँ आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा।’’

                 राजा सोचने लगा कि अवश्य आराम करूँगा पर एक बात पूछ बैठा- ‘‘यहाँ से कुछ दूर एक सरोवर के किनारे एक वृक्ष की डाल पर भी एक तोता बैठा हुआ था। वह रंगरूप में बिलकुल तुम्हारे समान था किन्तु उसमें तुम्हारे समान गुण नहीं थे। तुम तो मृदुल वाणी बोल रहे हो पर उसकी वाणी बड़ी कठोर थी।’’ तुम प्रेम और सेवा की बात कर रहे हो, किन्तु वह जान से मार डालने और लूटने की बातकर रहा था। क्या तुम उसे जानते हो? आश्चर्य है, वह बिलकुल तुम्हारी ही शक्ल का था।

                 तोते ने उत्तर दिया- ‘‘हाँ राजन्! मैं उसे जानता हूँ।’’ वह मेरा सगा भाई है। हम दोनोें एक ही वृक्ष पर रहते थे पर प्रचण्ड आंधी के झकोरों में पड़ने के कारण बिछुड़ गए। वह तो चोरों की बस्ती में जा गिरा और मैं ऋषियों के आश्रम के पास आ गिरा था। फलतः वह चोरों की बस्ती में रहने लगा और मैं ऋषियों के आश्रम में रहने लगा। चोरों की बस्ती में रहने के कारण उसने चोरों की बातें सीख लीं। चोर दिन रात हत्या और लूटपाट की बात करते रहते हैं।

                 वह चोरों के मुँह से जो कुछ सुनता है, उसे याद कर लेता है और जब किसी को देखता है तो उसे दुहराने लगता है। इधर ऋषियों के आश्रम में रहने के कारण मैंने ऋषियों की बातेें सीख ली हैं। अतिथियों के आने पर ऋषिगण जिस प्रकार प्रेम से बोलते हैं, उसी प्रकार मैं भी बोलता हूँ। जो जिस तरह की संगति में रहता है, उसका प्रभाव उस पर अवश्य पड़ता है। संगति के ही प्रभाव के कारण हम दोनों भाइयों में अलग-अलग गुण आ गए हैं।

                 तोते की बात सुनकर राजा के मुँह से अपने आप ही निकल पड़ा - ‘‘ संगति का प्रभाव अनिवार्य रूप से हृदय पर पड़ता है। अतः हमें अच्छी संगति करनी चाहिए।’’

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अंधा और कुबड़ा

                 किसी गाँव में दो मित्र रहते थे। एक अंधा था दूसरा कुबड़ा। एक साल उस गाँव में अकाल पड़ा। खाने-पीने की तकलीफ होने लगी। आखिर दोनों मित्रों ने कमाई करने के लिए परदेश जाने का निश्चय किया। कुबड़ा अंधे के कंधे पर बैठ गया और रास्ता बताने लगा।

                 चलते-चलते रास्ते में कुबड़े ने खेत की मेड़ पर चरते हुए गधों का एक झुण्ड देखा। उसने कहा कि भैया यहाँ गधे चर रहे हैं पर उनका चरवाहा कहीं दिखाई नहीं देता। अंधे ने कहा - ‘‘तो तुम एक गधे को पकड़ लाओ।’’ इसके पश्चात् दोनों मित्र गधे पर बैठ गए। कुछ देर पश्चात् रास्ते में एक झोपड़ी दिखाई दी तो कुबड़े ने अंधे से कहा कि दोस्त यहाँ झोपड़ी के बाहर एक बुढ़िया ऊँघ रही है और पास में एक सूप पड़ा है। अंधे ने कहा कि देखते क्या हो उठा लो वह सूप।

                 कुबड़े ने सूप कब्जे में कर लिया। चलते-चलते रास्ते में एक खेत आया। कुबड़े ने बताया कि यहाँ खेत में हल और बैल दोनों हैं पर किसान कहीं दिखाई नहीं देता। अंधा बोला कि ठीक है तुम हल का लोहे का फाल ले आओ। कुबड़ा हल का नोंकदार लोहे का फाल ले आया। थोड़ी दूर चले थे कि कुबड़े को एक कुआँ दिखाई दिया। उसने अंधे से कहा कि मित्र यहाँ कुएँ पर बाल्टी और रस्सी पड़ी है, पर पानी खींचने वाला गायब है। अंधे ने कहा कि तुम बाल्टी की रस्सी खोलकर ले आओ। कुबड़े ने अंधे से कहा कि रात घिर आई है अब क्या करें? 

                 अंधा बोला कि जरा आसपास देखों यहाँ किसी का घर नजर आता है क्या? कुबड़े ने चारों ओर देखा। थोड़ी दूर पर एक भव्य महल दिखाई दिया। दोनों मित्र उस महल के पास गए महल खाली था। अंधे ने कहा कि चलो आज की रात यही ठहरेंगे। महल का दरवाजा बंद करके दोनों मित्र एक कमरे में सो गए।

                 आधी रात गए बाहर बड़ा कोलाहल सुनाई दिया। चीख पुकार मचाने वाला एक राक्षस का परिवार था जो उस महल में रहता था और आधी रात को शिकार करके लौटा था। आवाजें सुनकर अंधे और कुबड़े की नींद खुल गई। खिड़कियों, दरवाजों को बंद देखकर राक्षस परिवार को बड़ा आश्चर्य हुआ। जरूर कोई महल में छिपकर बैठा है। यह सोचकर एक राक्षस ने बड़े जोर से आवाज दी कि हमारे महल में कौन है? 

                 कुबड़ा जवाब देने ही वाला था कि अंधे ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और स्वयं अकड़कर बोला कि तुम कौन हो? राक्षस ने उत्तर दिया कि हम तो राक्षस हैं। इस पर अंधे ने झट कहा कि हम तो राक्षस के दादाजी हैं। राक्षस विचार में पड़ गया। ये भला कौन हो सकता हैं? राक्षस का भी दादाजी। राक्षसों के सरदार ने कहा कि ठीक हैं यदि आप हमारे दादाजी हैं तो हमसे भी अधिक शक्तिशाली होंगे। जरा अपने बाल तो दिखाओ। अंधे ने रस्सी बाहर फेंकी। राक्षसों ने इतने मोटे और लम्बे बाल अपनी जिन्दगी में कभी नहीं देखे थे।

                 वे सब घबरा गए। अपनी शंका का समाधान करने की दृष्टि से राक्षस ने फिर पूछा कि तुम्हारे कान कैसे हैं? अंधे ने तुरन्त सूप बाहर फेंका। राक्षस तो इतना बड़ा कान देखकर आश्चर्य में पड़ गया। सरदार राक्षस ने फिर पूछा कि राक्षस के दादा जी आपके दाँत तो लोहे के चने चबाने लायक होंगे। 

                 अंधे ने उसी समय लोहे का फाल बाहर फेंका। उसे देखकर तो राक्षसों के हाथों के तोते उड़ गए। हाय! जिनके दाँत इतने मजबूत और बड़े हैं तो फिर वे दादा जी कैसे होंगे? जरूर बड़े खतरनाक होंगे। अंतिम बार परीक्षा की दृष्टि से राक्षस ने कहा कि यदि आप हमारे दादा जी हैं तो आपकी आवाज इतनी पतनी क्यों हैं अंधे ने महल के अंदर से कहा कि तुम्हारे कानों के परदे न फट जाएँ, इसीलिए हम धीरे-धीरे बोल रहे हैं। 

                 यदि तुम्हें हमारी सच्ची आवाज ही सुनना है तो लो सुनो.. ऐसा कहकर अंधे ने गधे के कानों को जोर से मरोड़ा। बस फिर क्या था। गधा लगा अपना राग अलापने.. ढेंचू....ढेंचू...। बाहर खड़े राक्षसों की तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। वे सब दुम दबाकर लगे भागने। किसी ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। अंधे और कुबड़े ने संतोष की सांस ली।

                 दिन चढ़ा तो वे लोग भोजन बनाने की तैयारी करने लगे। राक्षस की अपार धन दौलत को देखकर कुबड़े के मन में पाप का कीड़ा कुल बुलाने लगा। वह अंधे को मारकर सारी सम्पत्ति हड़पना चाहता था। इसी उद्देश्य से उसने अंधे के लिए जहरीला सांप पकाया। बीच में पानी की जरूरत होने पर वह अंधे को चूल्हे के पास बैठाकर खुद पानी लेने चला गया। उसे क्या पता था कि हांडी में एक जहरीला सांप पकाया जा रहा है, किन्तु तीव्र जहरीले धुएँ के कारण ही थोड़ी देर में उसे आँखों से दिखाई देने लगा।

उसने देखा हांडी में एक जहीला साप पकाया जा रहा है। अब वह समझ गया कि यह सब कुबड़े का चाल होगी जो मुझे मारने की नीयत से जहरीला सांप पका रहा था। जैसे ही कुबड़ा पानी लेकर आया, अंधे ने उसे लकड़ी से मारना शुरू कर दिया। पर यह क्या? पिटाई होेने पर कुबड़े का शरीर सीधा हो गया। 

                 उसका कूबड़ बैठ गया। पल भर में दोनों मित्र सारा माजरा समझ गए कि एक-दूसरे को मारने के चक्कर में दोनों के शरीर ठीक हो गये हैं। अब तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसी दिन से वे एक दूसरे के सच्चे मित्र बन गए तथा सुखपूर्वक उस भव्य महल में आराम से जिन्दगी गुजारने लगे।

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बंदर की चतुराई

                 एक बार कृष्णा नदी में भयंकर बाढ आई। नदी में आई इस अचानक बाढ़ के कारण नदी के किनारे स्थिति वन के अनेक पशु-पक्षी पानी के तेज बहाव में बह गये। कुछ पशु-पक्षियों ने दूर भागकर अपने प्राणों की रक्षा की तो कुछ पशु-पक्षी नदी के बीच एवम् किनारे स्थिति चट्टानों पर कई दिनों तक भूखे प्यासे सिमटे पड़े रहे। कृष्णा नदी की ऐसी जान लेवा बाढ़ की किसी को कल्पना तक न थी। 

                 कृष्णा नदी की यह बाढ़ कई दिनों तक अपना आतंक फैलाए रही। कुछ दिनों बाद बारिश कम होने के कारण नदी का जल स्तर कम होने लगा तो आसपास अनेक पशु-पक्षी मृत पड़े दिखाई देने लगे। जो लोग जीवित बचे थे उनमें एक बंदर का भी अपना परिवार था।

                 बंदर और उसके तीन बच्चे इस नदी की बाढ़ में किसी तरह कलेजे पर हाथ रखकर भूखे प्यासे एक ऊँचे टीले पर बैठे पानी कम होने की बात जोहते रहे। पानी कम होते ही नदी में रहने वाले कुछ जीव खुली हवा में सांस लेने के लिए ऊपर आने लगे। इन्हीं में एक घड़ियाल भी था। 

                 घड़ियाल ने देखा कि नदी के समीप के टीले पर एक बंदर अपने नन्हें बच्चों के साथ भूखा प्यासा बैठा हुआ है। शिकार को इतने पास देखकर उसके मुँह में पानी आ गया और वह बनावटी आँसू निकालकर बंदर से बोला- ‘‘हे बंदर भाई नदी का पानी कुछ कम हो गया है। आओं मैं तुम्हें अपनी पीठ पर नदी पार करा दूँ वरना खुद तो भूख प्यासे मरोगे और अपने बच्चोें को भी मार डालोगे।’’ बंदर घड़ियाल का अभिप्राय समझ गया था फिर भी उसने घड़ियाल की नेक नीयत पर संदेह प्रकट करते हुए कहा कि मैं कैसे मान लूँ कि तुम हमें सुरक्षित नदी पार करवाओगे? घड़ियाल हँसा और बोला-‘‘भाई ऐसे में जब सभी पर विपत्ति टूट पड़ी है 

                 मैं तुमसे धोखा करके क्या करूँगा।’’ वैसे भी तुम्हारे लिए पानी कम हुए बगैर टीले से नीचे उतरना कठिन काम है। यदि बाहर निकलना चाहते हो तो मुझ पर विश्वास करो, वरना मौत के मुँह में जाओगे। इतना कहकर घड़ियाल पानी के भीतर चला गया।

                 बंदर ने सोचा कि घड़ियाल की बात उसे मान लेनी चाहिए लेकिन अपनी तथा बच्चों की रक्षा तो उसे करनी ही थी। इसीलिए उसने एक चाल चलने की ठानी। थोड़ी देर बाद जब घड़ियाल ने बंदर से अपनी तरकीब के संबंध में पूछा तो बंदर बोला -‘‘घड़ियाल भाई इतने दिनों की बारिश में हम सब सूख कर काँटा हो गए हैं।’’ जब तक हफ्तों कुछ खा पी न ले शरीर बन नहीं पाएगा। 

                 सुनो तुम्हें बंदरिया का मांस पसंद है न? इस बाढ़ में वह नदी के दूसरे किनारे पर रह गयी है। हमारी राह देख रही होगी। इसलिए तुम हमें नदी पार करा दो तो मैं अपनी बंदरिया को तुम्हारे सुपुर्द कर दूँगा। घड़ियाल मान गया। उसने भी सोचा कि दुबले पतले मरियल बच्चों को खाने से बेहतर है कि बंदर की बात मान ली जाए और बंदरिया की दावत उड़ाई जाए। उसके मुँह में पानी आ गया। वह बंदर और उसके बच्चों को अपनी पीठ पर बैठाकर धीरे- धीरे नदी के दूसरे किनारे पर पहुँच गया। किनारे पहुँचते ही बंदर तुरन्त ही अपने बच्चों को सीने से चिपकाकर समीप के  झाड़ पर चढ़ गया तो घड़ियाल बोला हे भाई अब अपना वचन पूरा करो।

                  मुझे जोरों की भूख लगी है। बंदर बोला घड़ियाल भाई तुम आखिर बुद्धू के बुद्धू ही रहे। मैं भला क्यों अपनी बंदरिया तुम्हें देना लगा। शायद तुम्हें याद नहीं कि पिछली बार अपना कलेजा लाने के बहाने तुम्हें जो झांसा दे गया था मैं वहीं बंदर हूँ और तुम वही घड़ियाल।

                  अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कोई क्या नहीं करता। इसीलिए सही समय पर सही मार्ग पर चुनाव करने में ही बुद्धिमानी है। घड़ियाल बंदर की चतुराई पर स्तब्ध रह गया और आँसू बहाते हुए सीधे पानी के भीतर चला गया।

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बादशाह और फकीर

                 पुराने जमाने की बात है एक बादशाह था। वह बड़ा ही नेक और दयालु था, उदार भी था। जो कोई फकीर उसके द्वार पर पहुँचता खाली हाथ नहीं लौटाता था।

                 एक दिन एक फकीर उसके महल के दरवाजे पर पहुँचा। उसके कपड़े साफ थे किन्तु फटे पुराने थे। उसने पहरेदारों से कहा- ‘‘बादशाह से कहो कि उनका भाई मिलने के लिए आया है।’’

                 बादशाह के कोई भाई नहीं था, यह बात पहरेदारों को मालूम थी। इसके अलावा इस फटीचर फकीर का राज परिवार का व्यक्ति होने में कौन विश्वास कर सकता था? पहरेदारों को संदेह हुआ कि कदाचित इसके दिमाग में कोई खराबी हैं, किन्तु फकीर अपनी बात पर डटा रहा। उसके हाव-भाव तथा बातचीत में पागलपन का कोई चिन्ह प्रकट नहीं होता था।

                 पहरेदार बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने निवेदन किया हुजूर गुस्ताखी माफ हो। एक फकीर बाहर खड़ा है और वह अपने आपको आपका भाई बताता है। बादशाह कुछ देर तक तो चुप रहा फिर उसने मुस्कराकर कहा - ‘‘ उसे बुला लाओ।’’

                 फकीर जब बादशाह के पास पहुँचा तो बादशाह ने उसका बड़ा सम्मान किया। अपने पास मसनद के सहारे बैठाया और फिर उससे पूछा- ‘‘कहिए, भाई साहब। आपने यहाँ आने का कैसे कष्ट किया?’’ फकीर ने जवाब दिया, भैया इस समय मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। जिस महल में मैं रहता हूँ वह पुराना होेने के कारण गिरने वाला है।

                  मेरे पहले बत्तीस नौकर थे। वे मुझे छोड़कर चले गये। इसके अलावा जो मेरी पाँच रानियाँ थी वे भी निर्बल होने के कारण मेरी सेवा ठीक तौर से नहीं कर सकती। मैं आपके पास इसलिए आया हूँ कि मेरी कुछ सहायता कीजिए।

                 बादशाह ने खजांची को आज्ञा दी। इनको सौ रूपये दे दो।

                 सौ रूपये सुनकर फकीर बोला- ‘‘अपने भाई को आप केवल सौ रूपये दे रहे हैं। यह आपकी शान के खिलाफ है।’’ मैं तो बहुत बड़ी आशा लेकर आपके पास आया था किन्तु आपने मेरा कुछ भी ख्याल नहीं किया। बादशाह ने जवाब दिया रियासत का खर्च ज्यादा होने की वजह से खजाने में रूपया बहुत कम है। इसीलिए मैं आपकी अधिक सहायता करने में असमर्थ हूँ

                 बादशाह की बात सुनकर फकीर कहने लगा-‘‘ यदि आपके खजाने में रूपयों की कमी हैं तो मेरे साथ अफ्रीका महाद्वीप चलिए। वहाँ सोने के खाने हैं। जितना धन चाहे ले आइए।’’ बादशाह ने कहा-‘‘ बीच में समुद्र पड़ता है उसे कैसे पार करेंगे?’’ फकीर ने जवाब दिया -‘‘मैं आपके साथ चलूँगा और जहाँ मेरे पैर पड़ेंगे समुद्र अवश्य सूख जाएगा।’’ फकीर की बात सुनकर बादशाह बहुत हँसा और खजांची से बोला - ‘‘इन्हें एक हजार रूपये और दे दो।’’

                 जब रूपये लेकर फकीर चला गया तो राज-कर्मचारियों ने बादशाह से कहा- ‘‘अन्नदाता, आपकी और फकीर की जो बात हुई, उन्हें हम बिलकुल नहीं समझ सके।’’ बादशाह ने कहा- ‘‘सुनो! फकीर ने जो यह कहा था कि वह मेरा भाई है, एक तरह उसका कहना ठीक था। जिस तरह मैं इस मुल्क का बादशाह हूँ उसी तरह वह दीन (धर्म) का बादशाह है और इस नाते वह मेरा भाई है। लक्ष्मी और दरिद्रता दो बहने हैं। मैं लक्ष्मी का पुत्र हूँ और वह दरिद्रता का बेटा है।

                 उसने जो यह कहा था कि जीर्ण होने के कारण उसका महल गिरने वाला है। उससे उसका अभिप्राय अपने शरीर से था जो बूढ़ा होने के कारण निर्बल हो गया है और मृत्यु के  निकट है। उसने जो यह कहा था कि उसके बत्तीस नौकर उसे छोड़कर चले गए हैं। इससे उसका मतलब अपने दाँतों से था जो अब गिर गए हैं और मुँह बिलकुल पोपला हो गया है। उसने अपनी रानियों के बारे में कहा था कि कमजोर होने की वजह से उसकी सेवा नहीं कर सकती इससे उसका तात्पर्य अपनी आँख, कान इत्यादि पाँच इन्द्रियों से था जो अब शिथिल होने के कारण पूरा काम नहीं कर सकती।

                 राजकर्मचारियों ने फिर सवाल किया-‘‘हुजूर फकीर ने जो यह कहा था कि उसके पैर पड़ने से समुद्र सूख जाएगा, उसका क्या अभिप्राय था?’’ बादशाह ने मुस्कराकर जवाब दिया -‘‘उसने मेरे इस कथन पर कि खजाने में रूपये की कमी हो गई है, व्यंग्य किया था।’’ उसका यह उत्तर वास्तव मेें बड़ा चमत्कार पूर्ण था। अभिप्राय यह था कि जब वह इतना अभागा है कि महल में कदम रखते ही शाही खजाना खाली हो गया तो उसके पैर रखने से समुद्र भी अवश्य सूख जाएगा।

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