शुक्रवार, 18 जून 2021

Paakhandee Siyaar moral stories in hindi- पाखण्डी सियार नैतिक कहानियां हिंदी में

Paakhandee Siyaar moral stories in hindi- पाखण्डी सियार नैतिक कहानियां हिंदी में
Paakhandee Siyaar moral stories in hindi- पाखण्डी सियार नैतिक कहानियां हिंदी में

 पाखण्डी सियार

बात हजारों साल पुरानी है। उस समय जानवरों की पूँछ अर्थात दुम नहीं होती थी। जानवरों की यह दशा देखकर मंगल के राजा ने सभी जानवरों को पूँछ बाँटने की योजना बनाई। दिन तय किया और सारे जंगल में मुनादी करवा दी। बस फिर क्या था हर जानवर पूँछ लेने के लिए राजा के दरबार की तरफ भागा। राजा ने हर जानवर को एक-एक पूँछ दे दी। जंगल के एक कोने में तीन दोस्त रहते थे। भालू, खरगोश और सियार। 

ये तीनों मिलकर पूँछ लेने के लिए राजा के दरबार के लिए चल पड़े। रास्ते में चालाक सियार को शैतानी सूझी। उसने भालू और खरगोश से कहा- ‘‘हमें बहुत दूर चलना है, इसलिए रास्ते में कुछ खा पी लेना चाहिए।’’ पास में एक रसभरे फलों का बगीचा है। तुम दोनों वहाँ जाकर अपनी भूख मिटाओ। तब तक मैं जंगल में कोई शिकार कर लेता हूँ।

भालू और खरगोश सियार की बातों में आ गये और बगीचे में पहुँच गये। वहाँ से रसदार फल खाने में दोनोें सब कुछ भूल गये। इधर सियार सीधे राजा के दरबार पहुँचा और एक सुन्दर लम्बी पूँछ उसने राजा से अपने लिए माँग ली। 

राजा ने उसे मनचाही पूँछ की याद आई तो दोनों राजा के दरबार की तरफ भागे। जब वे राजा के सामने पहुँचे तो वहाँ केवल एक पूँछ बची थी, बाकि पूँछे दूसरे जानवर ले गये थे। दोनों बड़े निराश हुए। राजा ने दोनों की दीन-दशा देखी और कुछ देर विचार किया। उसके बाद बची हुई पूँछ के दो टुकड़े किए। एक टुकड़ा भालू को दिया और दूसरा टुकड़ा खरगोश को।

दूसरे दिन जब सियार ने भालू और खरगोश को देखा तो उन पर हँसने लगा कि उनकी पूँछ तो मेरी पूँछ से भी छोटी है। भालू और खरगोश सारा माजरा समझ गये कि यह सब सियार का किया कराया है। हमें दूसरी बातों में उलझाकर बेवकूफ बनाया है। भालू और खरगोश गुस्से से सियार पर टूट पड़े। सियार ने भाप लिया कि अब भालू और खरगोश उसे नहीं छोड़ेंगे। वह जान लेकर ही रहेंगे। वह फौरन जंगलों की ओर भाग खड़ा हुआ।

कई दिनों तक उसे जंगल में कुछ खाने को न मिला, बड़ी भूख लगी थी। अन्त में वह बस्ती में कुछ खाने की खोज में आया। अँधेरी रात थी लोग भी सो गए थे। घरोें के दरवाजे बंद थे। सियार गली-गली भटकता फिरा। एक धोबी का घर था, गधे बँधे थे। एक नाद में कपड़े भीग रहे थे और एक में कुछ और था।

सियार को गंध सी आई, सोचा शायद कुछ पेट में डालने को मिल जाए। ऊँची थी। वह कुदा और नाद में गिर पड़ा। जाड़े के दिन रात्रि का समय ठंडे पानी में गिरने से दुर्दशा हो गई। वह थर-थर काँपता सीधा जंगल की ओर भागा। प्रातः काल नाले के पानी से पेट भरने गया। पानी में छाया देखकर दंग रह गया।

 रात को वह नील की नाद में गिर पड़ा था सूरत बदल गई। वह बड़ा प्रसन्न हुआ। जंगल में जानवरों की सभा बुलाई। उसने घोषित किया कि मैं नीलाकार हूँ। मुझे ब्रम्हा ने जंगल का राजा बनाकर भेजा है जो मेरी आज्ञा नहीं मानेगा उसे बहुत भयंकर दण्ड मिलेगा। 

जानवरों ने ऐसे अद्भुत रंग का पशु कहां देखा था? उन्होंने सियार की बात मान ली। वह जंगल का राजा बन गया। सब पर रोब झाड़ने लगा। उस सियार ने शेर को मंत्री बनाया, चीते को सेनापति बनाया और दूसरे पशुओं की उसने सेना बनाई। वह बैठा-बैठा सबको आज्ञा देता था। 

शेर उसके लिए शिकार मारकर लाता था। रीछ उसे बेर और दूसरे फल लाकर देता था। वह खुद कोई काम नहीं करता था। सब पशु उसे नीलाकार महाराज कहकर पुकारते और प्रणााम करते थे। उस ढरेंगी सियार को अपनी जाति वालों से चिढ़ थी। वह सियारों को अपने पास भी नहीं आने देता था। उसे डर लगता था कि कोई सियार उसे पहचान न ले। किसी सियार को वह मिलने का समय नहीं देता था। 

उसने चीते से कह दिया था कि सभी सियारों को वन से भगा दो सियारों में नए राजा की इस आज्ञा से बड़ी हलचल मची थी। अभी तक किसी राजा ने उन्हें वन में से निकाला नहीं था।

कोई सिंह सियारों को मारता भी नहीं था। इस नए राजा ने तो उन्हें एक दम जंगल से बाहर ही खदेड़ने को कह दिया। सियार बार-बार आपस में मिलते थे और सलाह करते थे कि कैसे राजा को मनाया जाए। अपना घर छोड़कर वे बेचारें कहाँ जाते? लेकिन कोई उपाय नहीं दिखता था।

दुष्टरानी और छोटा भाई

एक दिन एक काने सियार ने अपनी जाति वालों से कहा कि यह नया राजा तो विचित्र है। इसके न तो दाँत मजबूत हैं, न पंजे। यह बिलकुल बलवान भी नहीं जान पड़ता। जंगल का राजा शेर तो दूसरे का मारा शिकार छूता तक नहीं और यह सदा दूसरोें से अपने लिए शिकार मंगवाता है। दूसरे ने कहा-‘‘मुझे भी दाल में कुछ काला दिखता है। यह सूरत शक्ल में हम लोगों जैसा ही है। केवल रंग में अन्तर है।’’

काने ने कहा-‘‘अच्छा हम सब उसके पास कुछ पीछे चलकर हुआं हुआं तो करें, अभी भेद खुल जाएगा।’’ सलाह पक्की हो गई। नकली सियार पशुओं के दरबार में बैठा था। पीछे की ओर से सियारों की खूब हुआं हुआं सुनाई पड़ी।


 नकली पाखण्डी सियार अपनी दशा भूल गया। उसने भी कान खड़े किए, मुख आकाश की ओर उठाया और पूँछ फटकार कर हुआं हुआं चिल्लाने लगा। अरे यह तो सियार है। सारे पशु उसके भेद को जान गये। पशुओं मेें क्रोध भरी पुकार मची। वे उस पर झपट पड़े जब तक और सियार भागे, तब तक तो उसकी बोटी-बोटी नोच डाली गई।

कहानी से शिक्षा

  • विश्वास पैदा करके किसी को धोखा नहीं देना चाहिए।
  • मनुष्य को पाखण्ड से बचकर रहना चाहिए। पाखण्डी मनुष्य का हाल पाखण्डी सियार की तरह होता है।
  • चाहे कितने भी बड़े बन जाओ अपनी बिरादरी अपने लोगों से हमेशा प्रेम रखो।

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