शुक्रवार, 18 जून 2021

Best Hindi Stories Ekata Kee Keemat| एकता की कीमत-हिन्दी कहानियाँ

Ekata Kee Keemat Hindi Stories| एकता की कीमत-हिन्दी कहानियाँ
Ekata Kee Keemat Hindi Stories| एकता की कीमत-हिन्दी कहानियाँ

 एकता की कीमत

एक नदी थी। उसके किनारे एक पेड़ पर चिड़ियों के एक जोड़े ने घोसला बनाया था। घोसले में चिड़ी ने अण्डे दिए थे। चिड़ी उनकी खूब देखभाल करती थी। जब चिड़ी बाहर दाना चुगने जाती थी तो चिड़ा उनकी रखवाली करता।

एक दिन चिड़ी चिड़े को घोंसले की रखवाली में छोड़ दाने की खोज में दूर निकल चली। जब बहुत देर तक चिड़ी नहीं लौटी तो चिड़ा भूख से व्याकुल हो उठा। वह नदी में पानी  पीने उतरा। वह ढेर सारा पानी गटक गया। फिर भी भूख कम नहीं हुई। चिड़ा भी दानों को खोज में निकल पड़ा।

 स्वार्थ का फल


उसी पेड़ पर एक गिलहरी रहती थी। वह बड़ी दुष्ट थी। उससे चिड़ियों का सुख देखा नहीं जाता था। इसलिए घोंसले को सूना पाकर वह झट पेड़ पर चढ़ गयी। डाल पर घोंसला, मानो उसे चिढ़ा रहा था ‘‘क्या तू बना सकता है इतना सुन्दर घोंसला?

गिलहरी की ईष्र्या जाग उठी। उसने घोंसले सहित अण्डे नीचे गिरा देने का विचार किया। वह जल्दी-जल्दी अपने तीखे दांतों से घोंसले के एक-एक तिनके को काटने लगी। तभी अचानक एक कटीला तिनका गिलहरी की आँख में चुभ गया। उसकी आँख से खून निकलने लगा। यह चीखते कराहते भाग आयी। थोड़ी देर बाद चिड़ी दाना चुगकर वापस आयी तो उसने देखा कि उसके अण्डे नीचे गिरे हुए हैं एवं घोंसला भी उजड़ गया है वह रोने लगी उसे पता था कि एक दिन ईष्र्यालु गिलहरी जरूर हमारा अहित करेगी। वह वहीं बैठकर रोने लगी। थोड़ी देर बाद चिड़ा भी आ गया। चिड़ी ने उससे रोते हुए कहा हमारे अण्डे उस दुष्ट गिलहरी ने नीचे गिरा दिये। उसने घोंसले भी काट डाला। हमसे हमारे बच्चे भी छील लिए। आखिर हमने उसका क्या बिगाड़ा था।

दुष्टरानी और छोटा भाई

चिड़ा चिड़ी को शान्त कराते हुए बोला-‘‘संकट के समय हिम्मत एवं धैर्य से काम लिया जाता है। जो हुआ सो हुआ। चलो हम तुम नये सिरे से घोंसला बनायें। तभी उन्होंने देखा नीचे वही गिलहरी कराह रही है। उसकी एक आँख में तिनका चुभा हुआ है। चिड़ा गिलहरी के पास जाकर बोला आखिर हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा हैं? तुमने हमारे अण्डे नष्ट कर दिये घोंसला भी तोड़ दिया। अब उसका परिणाम भुगत रही हो? चिड़ी बोली अच्छा है। इसे तड़पने दो। इसने हमारा घर उजाड़ा है।

‘‘हाँ मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं तुम्हारी सुख से जलती थी, मुझे माफ कर दो। मुझको लो और मेरी आँख में फसा हुआ तिनका निकाल दो। गिलहरी रो रही थी।

Moral Stories in Hindi

चिड़ा बोला ‘‘ठीक है। वादा करो फिर कभी किसी की खुशी देखकर ईष्र्या नहीं करोगी।

‘‘मैं वादा करती हूँ। अब मैं किसी से ईष्र्या नहीं करूँगी। लेकिन जल्दी से तिनका तो निकालों। मेरी आँखों में बहुत दर्द हो रहा है। चिड़ ने अपनी चोंच से उसकी आँख में चुभा तिनका निकाल दिया। गिलहरी को बहुत आराम मिला। अब वह चिड़-चिड़ी की दोस्त बन गयी और बोली कभी कोई मुसीबत पर मुझको आवाज देना। मैं अपनी जान पर खेलकर भी तुम्हारी मदद करूँगी।

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कुछ दिन बाद चिड़ा चिड़ी ने फिर एक सुन्दर घोंसला बना लिया। उसमें अण्डे दिये। अब अण्डे की देखभाल के लिए वे गिलहरी से कह जाते। दानों की खोज में दूर निकल जाते।

एक दिन उन अण्डों से सुन्दर प्यारे-प्यारे बच्चे निकल आए। चिड़ा-चिड़ी उनके लिए जब दाने लेने दूर चले जाते तो गिलहरी उनकी रक्षा करती।

एक दिन की बात है। चिड़ा-चिड़ी अपने बच्चों के लिए दाना लाने दूर निकल गए। गिलहरी बच्चों के पास थी, अचानक बच्चे चीखने लगे। एक विषैला साॅप पेड़ पर चढ़ा आ रहा था। बच्चे डरकर रोने लगे। वे अभी उड़ भी नहीं सकते थे। साॅप बच्चों को खाने के लिए उनकी तरफ बढ़ा चढ़ा आ रहा था। गिलहरी पलभर के लिए घबरा गयी। उसने सोचा मेरे कष्ट में चिड़ा-चिड़ी ने साथ दिया था। मुझे उनके इस उपकार का बदला चुकाना चाहिए। वह चीखने लगी ‘‘बचाओ, बचाओ’’ परन्तु मदद के लिए कोई नहीं आया। वह किसी भी कीमत पर बच्चों की रक्षा करना चाहती थी। आखिर बहुत विश्वास के साथ चिड़ा-चिड़ी अपने बच्चों को देखभाल एवं रक्ष के लिए उसके पास छोड़ गए थे।

अचानक गिलहरी के दिमाग में एक बात आई। वह पेड़ पर ही रहने वाली लाल चीटियों के पास गई। और उन्हें सब बातें बतायीं। लाल चीटियों का झुण्ड अचानक साॅप पर लिपट पड़ा। साॅप फुफकारता हुआ वापस लौट आया।

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गिलहरी ने राहत की साॅस ली। गिलहरी ने बच्चों को देखा। वे डरे सहमें से अपने घोसले में दुबके हुए थे। तभी चिड़ा-चिड़ी आ गए। गिलहरी ने सारी बात बताई उसने कहा-‘‘दुश्मन कमजोर पर हमला करते हैं, हमको एक होना पड़ेगा। अपनी शक्ति बढ़ानी होगी। चिड़ा-चिड़ी ने गिलहरी, कोयल, तोता, कबूतर, मैना, नीलकण्ठ को कहा। सब एक ही पेड़ पर रहने लगे। कबूतर इन सभी बच्चों का साथ खेलता रहता। अब सब एक थे।

मुसीबत के समय सब दुश्मन से टक्कर लेते। उनकी एकता को देखकर साॅप भी घबरा गया और एक दिन उस पेड़ के नीचे वाले अपने बिल से निकल कर कहीं और चला गया।

दोस्तों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें एकता के साथ रहना चाहिए। जिससे हम आने वाली मुसीबतों का सामना कर सकें। वास्तव में एकता में बहुत ताकत है। एकता की कीमत अनमोल है।


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 सयानी बकरी

Hindi story

एक जंगल, खूब घना, लम्बा-चैड़ा और सुन्दर तथा हरियारी से युक्त था। उसमें तरह-तरह के जानवर तथा पशु-पंक्षी रहते थे। जंगल के बीच में घास के लम्बे चैड़े मैदान भी थे। जहाँ बहुत सारे जंगली जानवर जैसे हिरन, नील गाय, जंगली भैंसे चरते रहते थे। उन्हीं के बीच एक जंगली बकरी भी रहती थी। बकरी अकेली नहीं थी। उसके तीन प्यारे-प्यारे बच्चे भी थे।

 सभी में गुरू ही है समाया

सफेद, काले, भूरे चिंगों वाले थे। ये बच्चे बड़े प्यारे थे। और घास मंे खूब खेलते थे। बच्चे तो मगन खेलते रहते, मैदानी घास पर उछलते कूदते, एक दूसरे को पटका-पटकी करते मैदानी घास पर उछलते कूदते, मगर उसकी माँ बड़ी दुःखी रहती। 

एक कहावत है-‘‘ बकरे की माँ कब तक खैर मनावेगी? वह घड़ी आ गई, जिसके लिये बकरी डरा करती थी। वह अमावस की काली रात थी। लम्बे घने पेड़ों के बीच से हवा ‘हू-हू’ करती डराती दौड़ भाग कर रही थी। बूँंदा बांदी से सारा जंगल भीग गया था। दूर सोन कुत्ते भौंक रहे थे। दूर सियार भी ‘हुंआ-हुंआ’ कर रहे थे। लगातार कई दिनों की बारिश से जंगल के जानवर भूखे थे। 

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यह बकरी को मालूम था। उसे लगा कि उसके दरवाजे पर कोई जानवर आकर खड़ा हो गया है। उसने अनुमान लगाया कि यह कलमुँहा सियार ही होगा। उसने छेद से बाहर देखने की कोशिश की। मगर बेकार अमावस की काली रात ने पूरे जंगल को निगल लिया था। 

बकरी उठ बैठी। तेज आवाज से बोली-‘‘हाय-हाय मेरे प्यारे बच्चे। तुम लोग तीन दिन से भूखे हो। सत्यानाश हो इस बारिश का, उठो। अब दुःख न करो। यह प्लेटें टेबल पर लगाओ तुम्हारा शिकार तो तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा है। अब वही करो जो मैं कहती हूँ।

बच्चे चिल्लाये ‘माँ खाना-खाना-खाना।’ उन्होनें जोर-जोर से चम्मच में प्लेटें बजाई।

उसे डर था कि किसी दिर शेर, चीता, तेंदुआ, भेड़िया या सोन कुत्ता उसके बच्चे को उठा ले जाएंगे। वैसे बकरी काफी तंदुरूस्त थी। उन माँसखोरों के आगे भला उसकी क्या चलती? फिर भी वह सदा चैकन्नी रहती। बच्चों को आस-पास ही रखती। सूरज ढलने से पहले ही अपने घर चली जाती।

 सच्चा उत्तराधिकारी

मगर इससे क्या? उसे मालूम था कि एक कलमुँहा सियार छुप-छुप कर उसके बच्चों को निहारा करता है। अपने मुँह से टपकने वाले लार को गुटकता रहता है। उसे मालूम था कि किसी न किसी दिन यह पाजी सियार धोखा करेगा।

बकरी थी बड़ी सियानी। उसे यह कहावत मालूम-‘‘सावधान को धोखा नहीं।’’ सो सियार से अपने परिवार को बचाने के लिए वह तरकीब सोचने लगी। उसके बच्चे तो अभी छोटे थे। मगर सयानी माँ के सयाने बच्चे भी तो थे। बकरी माँ ने बच्चों को सब समझाया और सबका काम बाँट दिया। उन्हें बताया कि जब विपदा आ पड़े तो घबराना नहीं चाहिए। जमकर उनका मुकाबला करना चाहिए। ‘‘साहस सौ रोगों की दवा है। ‘‘मेरे बच्चो, इसे गाँठ बांध लो। आखिर बकरी ने कहा-जरा सब्र करो, बस अभी मिला।

Moral Stories for kids

मगर पहले शिकार तो करना पड़ेगा। उसने पुकार कर कहा-ओ बेटे बड़के, धीरे से पिछले दरवाजे से निकलकर उसकी पिछली टाँगें जकड़ लो।

‘‘ओ बेटे छोटके, अगले दरवाजे से निकल कर उसकी गर्दन चाप लो।

ओ बेटी मझली चढ़ जा अटारी पर। कूद तो उसकी पीठ पर। तोड़ उसकी कमर, कर दे ढीला अंजर पंजर। और फिर हम उसे घसीट कर घर में लाएंगे। फिर तुम लोग जी भरकर खाना।

माँ ने फिर पूछा ‘डरोगे तो नहीं?’’

बच्चे चिल्लाएं, ‘‘नहीं, नहीं डरें हमारे दुश्मन।

माँ ने कहा, ‘अच्छा तो फिर एक साथ निकल पड़ो, देखों घायल मत होना।

बच्चे एक साथ खटर पटर करने लगे।

 दुष्टरानी और छोटा भाई

बाहर सियार सब कुछ सुन रहा था वह अपने को बड़ा शूरबीर समझता था। मगर बकरी की बात सुनकर वह डर गया। जिसके बच्चे इतने निडर और बहादुर हैं, उसकी माँ कैसी होगी?

यहाँ से तो भाग निकलना ही ठीक है। सो सियार तुम दबाकर भाग गये। अपने झुण्ड से मिलकर हुआ-हुआ रोने लगे।

बकरी ने जान लिया कि सियार भाग गया है। इस तरह कमजोर बकरी अपने बुद्धि बल से अपने बच्चों का जीवन बचा सकी। एक कहावत है कि अकल बड़ी या भैंस। सच पूछो तो बड़ी भैंस ही दिखती है। अकल तो कहीं दिखती ही नहीं। मगर भैंस को उसके समाने हार माननी ही पड़ती है। इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि जो अपनी अक्ल का उपयोग ठीक समय पर ठीक ढंग से करते हैं, जीत उन्हीं की होती है।

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 जादुई मोती

सैकड़ो वर्ष पहले की बात है। एक गाँव में एक निर्धन परिवार रहता था। उस परिवार में केवल दो ही सदस्य थे, एक स्वयं रामू व दूसरी उसकी बूढ़ी माँ, जो हर समय खटिया पर बीमार पड़ी रहती थी। पैसे के अभाव में रामू उसकी देख-रेख भली प्रकार से नहीं कर पाता था।

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रामू जंगल से लकड़ियाँ काटकर लाता और उन्हें उचित दामों पर बेचकर जैसे-तैसे अपनी व अपनी माँ की जीविका चलाता था। रामू के बचपन में ही उसके पिता की मृत्यु हो गई थी तभी से परिवार के भरण-पोषण का भार उसके कंधो पर आ गया था।

 मनुष्य अपना स्वामी स्वयं

जब रामू तीन-चार वर्ष का था, तब उसके पिता ने उसे एक सुन्दर सी बकरी लाकर दी थी। उसे रामू बहुत प्यार करता था। इसके लिए वह जंगल से हरी-हरी घास काटकर लाता और खिलाता। इसी तरह कई वर्ष बीत गए।

एक दिन की बात है कि रामू ने जंगल में लकड़ियाँ काटने के बाद अपनी बकरी के लिए टोकरी भर घास काटी और घर चल दिया। दूसरे दिन जब वह उसी स्थान पर पहुँचा तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जहाँ से कल उसने घास काटी थी, वहाँ रात भर में फिर उतनी ही लम्बी घास उग आई है। उसने लकड़ी काटने के बाद घास टोकरी भरी और घर लौट आया। तीसरे दिन रामू फिर उसी स्थान पर पहुँचा तो पाया कि आज फिर घास उतनी ही लंबी है जितनी कि कल थी।

अब रामू रोज उसी स्थान पर जाता और लकड़ियाँ काटने के बाद अपनी बकरी के लिए घास काटकर ले जाता। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उसने सोचा आखिर घास की जड़ मेें ऐसा क्या है? जिससे घास रोज बढ़ जाती है। यह सोचकर उसने घास के नीचे जमीन खोदना शुरू कर दी। कुछ ही देर बाद उसने देखा कि मिट्टी के बीचों बीच कोई चीज चमक रही है। रामू ने हाथ अंदर डालकर उसे निकाला। वह एक मोती थी। रामू के हृदय में खुशी के तार झनझनाने लगे। माँ को मोती दिखाने वह घर पहुँचा।

 श्रेष्ठता

घर पहुँचते ही उसके कदम ठिठक गए। उसकी अपार खुशी को दुःख में बदलते देर न लगी। उसने पाया कि माँ जीवन की अंतिम साँसे गिन रही हैं। उसे देखकर माँ बोली ‘‘बेटा आ गया तू, अपना ख्याल रखना, हमेशा मेहनत से पाया हुआ धन ही खाना, कभी हराम का नहीं, माँ के गले से रूक रूक कर निकलती यह आवाज बिल्कुल ही रूक गई। रामू दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

परोपकार का पौधा

कुछ दिनों तक तो रामू को माँ की बहुत याद आई। वह बेचारा दुःखी मन से अकेला ही रहने लगा। एक दिन रामू को मोती का ध्यान आया। उस मोती को उसने चावल के डिब्बे में डाल दिया था। रामू ने चावल के डिब्बे को संभाला तो उसे डिब्बा पहले से अधिक भारी लगा और जब उसने ढक्कन खोला तो पाया कि डिब्बा चावलों से पूरा भरा है जो कि मोती रखने से पूर्व बहुत खाली था। यह देखकर उसकी आँखें फटी रह गई। उसने अगले ही पल उसमें से चावल निकाले और थोड़े से चावल उसकी तली पर ही पड़े रहने दिये। फिर मोती डाल कर उसे बंद करके रख दिया। अगले दिन जब उसने डिब्बा खोला तो पाया आज फिर डिब्बा चावलों से पूरा भरा है। उसे यह समझते देर न लगी कि मोती जादुई है। अब उसने मोती को रूपये पैसों के डिब्बे में डाल दिया। देखते ही देखते उसके पास अपार धन इकट्ठा हो गया।

वह भी भरकर खर्च करता मगर उसका धन कम ही नहीं होता? इस तरह वह बड़ा वैभवशाली बन गया। जैसे-जैसे वह अमीर होता गया, माँ की कही हर बात उसके दिमाग से निकलती गई। धन ने उसे बहुत लालची बना दिया

एक दिन रामू के पास एक पड़ोसी कुछ पैसा उधार मांगने आया। कुछ नहीं दूंगा, ऐसे भिखमंगे, यहां बहुत आते हैं। निकल जा यहां से। रामू ने चिल्लाकर कहा तो वह आदमी अपना सा मुँह लेकर लौट गया। एक बार मूसलाधार पानी बरस रहा था। सर्दी की भयानक काली रात थी। एक गरीब औरत ने पानी व ठण्ड से बचने के लिए रात गुजारने को रामू के यहाँ जगह मांगी। रामू ने उसे भी बेरहमी से भगा दिया।

 हीरा ने कान पकड़े

मोती मिलने से पहले रामू एक उदार मेहनती आदमी था लेकिन अब उसकी दुष्टता और कृपणता दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। दुर्भाग्यवश एक बार उस गाँव में भयंकर अकाल पड़ा। लोग भूख से मरने लगे। पर रामू के यहाँ अकाल की छाया तक नहीं थी। उसके यहाँ अन्न के भण्डार भरे पड़े थे। यहां तक कि वह अपनी मुर्गियों को, बकरी को भी खूब अच्छा अनाज खिलाता था।

आखिर भूख से गाँव वालों ने निर्णय किया कि हम लोग अंतिम बार रामू के पास जाएं और उससे कुछ अनाज उधार देने की विनती करें। लेकिन जब रामू के कानों में गाँव वालों के इस निर्णय की भनक पड़ी तो उसने सोचा इन भिखमंगों के आने से पहले मैं ही क्यों नहीं गाँव छोड़कर चला जाऊँ।

यह सोचकर वह एक धन की पोटली और मोती लेकर शहर की तरफ चल दिया। धन की पोटली उसने राह में खर्च के लिए ली थी। चलते-चलते वह घर से बहुत दूर निकल आया। शाम ढल चुकी थी, अंधेरा छा गया, देखते देखते रात हो गई। जंगल का सूनसान रास्ता था। अचानक तीन डाकुओं ने उसे घेर लिया। रामू तुरन्त उनका मतलब भांप गया। उसने उन तीनों से नजर बचाकर मोती को अपने मुँह में रख लिया क्योंकि वह जानता था कि यह मोती डाकू उससे अवश्य हड़प लेंगे। डरते-डरते उसने धन की पोटली उनके हवाले कर दी। लेकिन तब भी डाकुओं ने रामू के शरीर का झाड़ा लिया, पर उन्हें कुछ भी न मिला। धन की पोटली लेकर तीनों डाकू अपने घोड़े पर सवार होकर चल दिए।

रामू खुश था क्योंकि इतना सब कुछ होने पर भी उसका मोती उसके पास ही था। तीनों डाकू उसके आगे धूल चाटकर लौट चुके थे। रात बहुत गहरी हो चुकी थी। रामू बहुत थका हुआ था। उसने बरगद के पेड़ की मोटी सी डाल पर ही रात गुजारने का निर्णय लिया। वह पेड़ की डाल पर बैठ गया और कुछ ही पल में उसकी आँख लग गई। थकान होने के कारण वह बहुत गहरी नींद सो गया और उसे इस बात का आभास तक न हआ कि वह नींद में कब मोती निगल गया।

सुबह चिड़ियों के मधुर कलरव गूंजने से रामू की आँख खुली। उठते ही इसे बहुत तेज प्यास लगी। उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसके पेट में आग जल रही हो। जीभ और कंठ सूखे जा रहे थे। जल्दी-जल्दी वह समीप की नदी पर बैठ गया और उसका पानी चुल्लू से भर-भर कर पीने लगा। वह बहुत देर तक पानी पीता रहा, पर उसकी प्यास न बुझी। बेचैन रामू नदी के किनारे पेट के बल लेटकर नदी में मुँह लगाकर पानी पीने लगा और घंटो पीता रहा, मगर उसकी प्यास नहीं बुझी। 

थोड़ी ही देर में उसने महसूस किया मानो उसका पूरा शरीर आग की लपटों से घिरा हुआ है। सिर घूम रहा है। हाथ, पैर गर्म हो रहे हैं। सांस लेना मुश्किल हो रहा है। उसकी प्यास ज्यों की त्यों है। वह फिर पानी पीने को झुका। अचानक जल में उसने एक भयानक आकृति देखी। जिसके मुँह से आग और धुएँ की लपटें निकल रही थीं। बड़ी-बड़ी लाल-लाल आंखें से चिंगारी छूट रही थी। 

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रामू को समझते देर न लगी कि वह उसकी आकृति है। यह भयभीत होकर चीखने लगा ‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं रामू हूँं। उसकी आवाज पूरी जंगल में गूंजने लगी। शोर सुनकर पक्षी घबराकर उड़ गए। रामू भयभीत होकर इधर से उधर दौड़ने लगा। किन्तु उसके सारे प्रयत्न व्यर्थ हो गए। रामू राक्षस फिर से आदमी नहीं बन सका।

इस तरह मेहनत करके कमाने वाला हंसमुख रामू माँ की बातों को भूलकर धन के लालच में एक क्रूर भयानक राक्षस बन गया। अब लोग उसके पास आने से भी डरते थे। उसे कोई नहीं पहचानता था कि वह रामू है।

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Short Stories In Hindi Putaliyaan Bolee | पुतलियाँ बोली हिंदी में लघु कथाएँ

Short Stories In Hindi Putaliyaan Bolee |  पुतलियाँ बोली हिंदी में लघु कथाएँ
Short Stories In Hindi Putaliyaan Bolee |  पुतलियाँ बोली हिंदी में लघु कथाएँ

 पुतलियाँ बोली

प्राचीन काल में वीरपुर नाम का एक नगर था। वहाँ के राजा थे वीरभद्र। वीरभद्र अपने पूर्वजों की तरह न्यायप्रिय, बुद्धिमान एवं प्रजापालक थे। उनके राज सिंहासन में दो पुतलियाँ लगी हुई थीं। एक का नाम था रूपानी और दूसरी का कल्याणी। 

रूपानी राजा से हमेशा सौन्दर्य का बखान करती और कल्याणी प्रजा के हित की बात राजा को बताया करती थीं दोनों पुतलियाँ की आपस में बिलकुल नहीं निभती थी। वे एक-दूसरे की काट में लगी रहती थीं। रूपानी हमेशा राजा को समझाने की कोशिश करती-‘रूप और सौंदर्य ही दुनिया में सबसे अच्छे हैं। एक राजा को इन्हीं में ज्यादा समय लगाना चाहिए।’ 

शरणागत-रक्षक महाराज शिबि

कल्याणी गुणों का बखान करती। वह गुणों को रूप से श्रेष्ठ बतलाती। राजा दोनों की बातें सुनकर, निर्णय अपनी बुद्धि और विवेक से लिया करते थे। वह हमेशा चतुर सभासदों की सलाह लेकर ही काम करते थे।

कुछ समय बाद वीरभद्र बहुत बीमार पड़े। अपना आखिरी समय जान, उन्होंने अपने बेटे छविप्रिय को बुलाकर कहा-‘‘बेटा, यह मेरा आखिरी समय है। अब सिंहासन पर तुम्हें बैठना है। तुम्हें एक जरूरी बात बता रहा हूँ। तुम इन दोनों पुतलियाँ में से कभी किसी का अनादर मत करना। इन दोनांेे में हमेशा संतुलन बनाए रखना।’’ कुछ दिन बाद राजा वीरभद्र स्वर्ग सिधार गए।

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वीरभद्र के राजसिंहसन पर छविप्रिय आसीन हुए। वह बड़े ही निरंकुश और विलासी थे। हमेशा राग-रंग में डूबे रहते थे।

काफी दिनों बाद छविप्रिय पहली बार राज दरबार में आए। वह सिंहासन पर बैठे, तो कल्याणी बोली-‘‘ राजन्, आप बहुत अधिक विलासी होते जा रहे हैं। राग-रंग और नृत्य संगीत से ही राजकार्य नहीं चलता। आप अपने चतुर सभासदों की भी सलाह नहीं मान रहे हैं। गुणों का सम्मान करना सीखिए। अपने पिता की बातें याद रखें।’’

राजा को उसकी यह बात अच्छी न लगी। वह कुछ बोलना चाहते थे, तभी रूपानी बोल पड़ी-‘‘राजन्, आप कल्याणी की बातें में न आइए। यह हमेशा गुणों का ही बखान करती रहती है। इसे यह नहीं मालूम कि सौंदर्य का जीवन में कितना महत्व है। सुंदर चीजें ही तो आनन्द और सुख प्रदान करती हैं। बिना इनके जीवन नीरस हो जाता है।’’

राजा बोंला-‘‘तुम ठीक कहती हो। सौन्दर्य के बिना जीवन बिलकुल उजाड़ लगता है। मैं राजमहल को संुदर ढंग से सजाऊँगा। राज वाटिका के कंटीले पौधों को उखाड़, सुन्दर-सुन्दर पौधे लगवाऊँगा।’’

कुछ दिनों बाद जब राजा फिर दरबार में आए, तो दरबार की रौनक ही बदल गई थी। बड़े खुश थे राजा। वह ज्यों ही सिंहासन पर बैठे, कल्याणी बोली-‘‘राजन्, आपका एक ओर ही झुकाव ठीक नहीं। सौंदर्य के साथ-साथ गुणों का भी सम्मान होना चाहिए। वर्ना राज्य पर विपत्ति घिर आएगी।’’

कल्याणी की बात राजा को फिर अच्छी न लगी। वह कुछ जवाब देते, उसके पहले ही राजवैद्य बोल पड़े-‘‘हाँ, राजन्, कल्याणी ठीक कहती है। आप उसकी बातों पर भी विचार कीजिए।’’

 अनोखा बाग

राजा ने गुस्से में कहा-‘‘तुमसे कौन सलाह माँग रहा है? बीच में बोलकर तुमने भारी अपराध किया है। तुम्हें देश से निकाल दिया जाता है।’’ राजा के हुक्म पर सिपाहियों ने राजवैद्य को देश की सीमा से बाहर कर दिया।

संयोग की बात, दूसरे ही दिन राजवाटिका में टहलते हुए राजकुमार को एक साॅप ने डस लिया। बहुत उपचार हुआ, किन्तु उसे कोई बचा न सका।

पुत्रशोक से दुखी राजा दरबार में पहुँचे। सिंहासन पर बैठना चाहा, तभी कल्याणी बोली-‘‘राजन्, देख लिया, मेरी बात न मानने का परिणाम। अगर वाटिका से सारे कंटीले पौधों को न हटाया गया होता, तो साॅप वाटिका में प्रवेश ही न कर पाता, क्योंकि उनमें बहुत से ऐसे पौधे भी थे, जिनकी महक से साॅंप दूर भागता है। 

साॅप के डसने के बाद भी राजकुमार को मृत्यु से बचाया जा सकता था, मगर आपने तो राजवैद्य को देश निकला दिया था। राजवैद्य के पास विषधर से बचाने की अचूक औषधियाँ थीं। मैं बराबर आपसे कहती रही हूँ, गुणों को महत्व दीजिए। मगर आप सुनते ही नहीं।’’ कहकर पुतली मौन हो गई।

सत्य बोलो

अच्छा मौका देख, दूसरी पुतली रूपानी बोली-‘‘कल्याणी, ऐसे शोक के समय में तुम राजा का उपहास कर रही हो। यह अच्छी बात नहीं।’’

राजा पहले से ही झंुझलाएं हुए थे। रूपानी की बातों ने आग में घी का काम किया। गुस्से में उन्होने कल्याणी से कहा-‘‘आज के बाद तुम मुझसे बात न करना।

राजा के निर्णय से सारे सभासद चकित रह गए। कुछ न राजा को अपना निर्णय वापस लेने की सलाह दी, लेकिन राजा ने किसी की एक न सुनी। कल्याणी उसी दिन से चुप हो गई।

अब राजा के ऊपर रूपानी का एकाधिकार था। राजा दिन-रात राग-रंग में डूबे रहने लगे। बूढ़े सभासदों को दरबार से निकाल, उनकी जगह नौजवान एवं रूपवान सभासदों की भर्ती की गई। यहाँ तक कि राजमहल के पुराने और विश्वासपात्र दास-दासियोें की भी छुट्टी कर दी गई।

इन सारी बातों की सूचना पड़ोसी राजा को मिली। वह बड़ा खुश हुआ। उसकी वीरपुर से पुरानी दुश्मनी थी। कई बार दोनों में युद्ध हो चुका था। बदला लेने का अच्छा अवसर देख, पड़ोसी राजा ने वीरपुर पर हमला कर दिया।

वीरपुर के राजा तो रंगरेलियों में डूबे थे। सेना में भी ज्यादातर अनुभवहीन और नए सिपाही ही थे। पुराने योग्य एवं लड़ाकू सैनिकों की छुट्टी कर दी गई थी। इसके अतिरिक्त वीरपुर से निकाले गए बहुत से दास-दासियों से भी बहुत सारी गुप्त जानकारियां शत्रु ने प्राप्त कर ली थी।

हमने की खबर सुन, राजा छविप्रिय घबरा गए। क्या करें। सोचने लगे-‘‘शायद कल्याणी पुतली के नाराज होने से ही विपदा आई है।’ भागे-भागे सिंहासन के पास गए। क्षमा माँगकर कल्याणी से उपाय पूछा। पुतली बोली-‘‘राजन्, राग-रंग में डूबे राजा का यही हाल होता है। अब भी भला चाहो, तो अपने पुराने सभासदों, अनुभवी मंत्रियों और भूतपर्व सेनापति से सलाह लो। मेरी मानो, आधी रात होने पर शत्रु पर जोरदार हमला करो। शत्रु आपसे कम ताकतवर है। साहस से काम लो।’’

जैसा संग वैसा रंग

राजा ने वहीं किया। रात में अचानक हमले से शत्रु घबरा गए। सेना के पैर उखड़ गए। इस तरह आई विपत्ति टल गई। अब राजा की समझ में आ गया कि अनुभवी सभासदों से सलाह लेना क्यों जरूरी है? बस, उसी दिन से राजा, प्रजा के कल्याण और राज को सुदृढ़ करने मे जुट गए। पुतलियाँ अब भी उनसे अपनी बातें कहतीं, मगर राजा उनकी बातें सुनकर अब अपने विवेक से काम लेते थे।

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Best Hindi Kahani Anokha Baag- अनोखा बाग बेस्ट हिन्दी कहानी

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 अनोखा बाग

गंगा नदी के तट पर एक राज्य था श्यामपुर। एक दिन वहाँ के राजा वीरभद्र का दरबार लगा था। राजा सोने के सिंहासन पर एवं उनके मंत्री चांदी के आसन पर बैठे थे। राजा के पीछे खड़ी दासियाँ चंवर डुला रही थीं। राज्य की समस्याओं पर विचार करने के बाद राजा वीरभद्र ने अपने मंत्री से पूछा-‘‘मंत्रिवर, तीनोें लोकों में सबसे सुन्दर बाग किसने लगवाया है?’’

‘‘राजन इंद्रलोक में नंदन-कानन नामक बाग तीनों लोकों में सबसे सुन्दर बाग है। वहाँ सभी देवी-देवता भ्रमण करने के लिए आते है।’’ मंत्री ने बताया।

राजा ने आदेश दिया-‘‘मंत्रिवर, मैं अपने राज्य में नंदन-कानन से भी सुन्दर एक बाग लगाना चाहता हूँ। आप लोग एक अनुपम बाग लगाने का प्रबंध कीजिए।’’

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राजा की आज्ञा के अनुसार देश-विदेश से पौधे मंगवाकर लगवाए गए। उनकी सुरक्षा के लिए कंटीली बाड़ लगवा दीं लेकिन आश्चर्य, शाम को पौधे लगवाए गए और सुबह तक सारे पौधे लापता हो गए। कंटीली बाड़ ज्यों की त्यों लगी रही।

क्रोध में आकर राजा ने अपने गुप्तचरों को इसका पता लगाने के लिए कहा, लेकिन पौधों के गायब होने का रहस्य कोई नहीं जान सका। राजा ने कई बार बाग लगवाने का प्रयास किया, पर बाग नहीं लगा। राजा मन ही मन उदास रहने लगे।

राजा वीरभद्र के चार पुत्र थे। अपने पिता की उदासी का कारण जानकर उनके तीन पुत्र भानुप्रताप, चन्द्रप्रताप और सुरेन्द्र प्रताप ने बारी-बारी से बाग लगाने का प्रयास किए लेकिन नतीजा कुछ न निकला। शाम को पौधे लगवाए गए और वे सुबह तक गायब हो गए। अंत में सबसे छोटे राजकुमार उदयप्रताप ने कहा-‘‘पिता जी, मुझे भी एक मौका दीजिए। मैं एक बार प्रयास करना चाहता हूँ।’’

राज वीरभद्र ने उदास स्वर में कहा-‘‘जिस काम को मैं और तुम्हारे बड़े भाई नहीं कर सके, उसे तुम कैसे पूरा करोगे?’’

राजा की बात सुनकर मंत्री ने कहा-‘‘राजन, छोटे राजकुमार का मन छोटा मत कीजिए। एक बार उन्हें भी कोशिश करने दीजिए।’’

मंत्री की सलाह मानकर राजा ने उसे आज्ञा दी-‘‘जाओ, एक बार तुम भी प्रयास करके देख लो।’’

लालची साधु और धूर्त नाई


छोटे राजकुमार उदयप्रताप ने देखा था कि उसके पिता और बड़े भाई बाग की सुरक्षा का भार सिपाहियों को सौंपकर स्वयं महल में चैन की नींद सो जाते थे। उसने सबसे पहले सिपाहियों की छुट्टी कर दी और स्वयं बाग की रखवाली करने की योजना बनाई।

बाग में पौधे लगवाकर उसने एक छोटी सी झोंपड़ी बनवाई और रात में उसमें स्वयं छिपकर बैठ गया। बाहर उसने जल भरी एक नांद रखवा दी। काफी रात बीतने पर उसे थोड़ी झपकी आने लगी। उसने बाहर निकलकर अपनी आँखों पर ठंडे पानी के छींटे मारे, फिर अन्दर जाकर बैठ गया।

ठीक आधी रात के समय आंधी जैसी सांय-सांय की आवाज सुनकर उसके कान चैकन्ने हो गए। उसने कौतुहलवश झोंपड़ी के बाहर झांगा। हवा एकदम शांत थी। आकाश में चांद-तारे चमक रहे थे। 

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स्वच्छ चांदनी में उसने अचानक देखा कि दो पंखों वाला घोड़ा धीरे-धीरे आसमान से नीचे उतर रहा है। बाग की धरती पर पैर रखे बिना ही उसने ऊपर ही ऊपर पौधों को चट करना शुरू कर दिया। पौधों का सफाया करने के बाद एक नांद में पानी देखकर घोड़े का मन ललचाया। उसने पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। खा-पीकर मस्त होने के बाद घोड़े ने सोचा-‘ अभी तो आधी रात बाकी है, क्यांे न थोड़ी देर विश्राम कर लूँ? सुबह होने से पहले उड़ जाऊँगा।’

यही सोचकर घोड़ा जमीन पर उतरा और खड़े-खड़े झपकी लेने लगा। छोटा राजकुमार छिपकर घोड़े की हर गतिविधि को देख रहा था। घोड़े को ऊंघता हुआ देखकर वह सधे कदमों से आगे बढ़ा और उछलकर घोड़े की पीठ पर सवार हो गया। ज्यों ही राजकुमार घोड़े की पीठ पर बैठा, घोड़ा तेजी से आसमान में उड़ चला। घोड़े की पीठ पर न तो गद्दी थी और न ही उसके मुँह में लगाम थी। 

दुर्बलता का पाप


छोटे राजकुमार ने घोड़े के अयाल को कसकर पकड़ लिया। घोड़ा रातभर आसमान में चक्कर काटता रहा और राजकुमार भी उसकी पीठ से चिपका रहा। जब पूरब के आकाश में सूरज की लाली छाने लगी, तो घोड़े ने कहा-‘‘भई, दया करके मेरी पीठ से उतर जाओ। सुबह होने से पहले यदि मैं अपने अस्तबल में नहीं लौट सका, तो मुझे कड़ी सजा मिलेगी।’’

छोटे राजकुमार ने कहा-‘‘पहले बताओ कि तुम कौन हो और मेरे बाग को क्यों नष्ट करते हो?’’

घोडे़ ने बताया-‘‘मैं इंद्रलोक का काला घोड़ा हूँ। मुझे पता चला कि राजा वीरभद्र मृत्युलोक में नंदन-कानन से भी सुन्दर बाग लगाना चाहते हैं। वह बाग लगाने से सफल हो जाते, तो देवराज इन्द्र का अपमान हो जाता, इसलिए मैं तुम्हारे बाग को नष्ट कर देता था।’’

छोटे राजकुमार ने कहा-‘‘तुम बडे़़ दुष्ट हो। मैं तुम्हें अपने अस्तबल में बाँधकर रखूँगा।’’

घोड़े ने कहा-‘‘यदि तुम मुझे छोड़ दोगे, तो मैं तुम्हारी दो मनोकामनाएं पूरी कर दूँगा।’’

 दुष्टरानी और छोटा भाई


छोटे राजकुमार ने कहा-‘‘ऐसी बात है तो नंदन कानन से सुन्दर न सहीं, परन्तु मेरे बाग को तुम रातो-रात नंदन-कानन जैसा बना दो। मेरी दूसरी कामना है कि जब मैं बुलाऊँ, तो तुम आकर मेरी मदद करो।’’

घोड़े ने कहा-‘‘ऐसा ही होगा। तुम्हें मेरी केवल एक शर्त मानी पड़ेगी। यदि तुमने मेरा रहस्य किसी को बता दिया, तो मैं फिर कभी नहीं आऊँगा।’’

छोटे राजकुमार ने घोड़े की शर्त मान ली। घोड़े ने राजकुमार को बाग में उतारा और वह तेजी से आसमान की ओर उड़ गया। छोटे राजकुमार ने अपना बाग देखा, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। ऐसा बाग न तो उसने कहीं देखा था और न ही इसके बारे में कहीं सुना था। बाग में आम, अमरूद, कटहल, बेर, सेब, नारियल, केला, पपीता, हर तरह के पेड़ लगे थे। पेड़ों पर हर मौसम के फल लगे थे। कुछ फल कच्चे, कुछ फल पके और कुछ भूमि पर पड़े थे। गिलहरियाँ पके फलों को कुतर-कुतरकर खा रहीं थी।

एक ओर गेंदा, गुलाब, चंपा, गंधराज, हरिसंगार, बेली, जूही, चमेली और रजनीगंधा के फूल खिले थे। फूलों पर रंग बिरंगी तितलियाँ मंडरा रही थीं। भौंरे गुंजार कर रहे थे। बाड़ पर अंगूर की तलाएँ छाई थीं। तालाब में कमल के फूलों के बीच हंसों के जोड़े तैर रहे थे।

छोटे राजकुमार ने घूम-घूमकर बाग देखा और सूरज निकलने से पहले अपने महल में जाकर सो गया। उसने बाग के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा। 

सुबह भ्रमण के लिए निकले लोंगों ने बाग देखा, तो उनकी आँखें फटी रह गई। लोगों ने पहले छककर फल खाए, तब जाकर राजा को इस बात की सूचना दी। राजा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्होंने स्वयं आकर बाग देखा, तो वह आँखें मलते रह गए।

राजा वीरभद्र छोटे राजकुमार के इस काम से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उसे राजगददी सौंपने की घोषणा कर दी। राजा की घोषणा सुनकर तीनों बड़े राजकुमारों ने राज्य छोड़ने का फैसला कर लिया। छोटे राजकुमार को इस बात का पता चला, तो उसे बहुत दुःख हुआ। उसने अपने पिता से जाकर कहा-‘‘पिताजी, नियम के अनुसार तो सबसे बड़े भाई को ही राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए।’’

राजा ने कहा-‘‘नहीं बेटे, सबसे योग्य व्यक्ति को ही राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए। तुमने अद्भुत बाग लगाकर अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है।’’

करेले

छोटा राजकुमार बोला-‘‘पिता जी यह सब तो काले घोड़े का चमत्कार है।’’

असावधानी में घोड़े का नाम बोलकर छोटे राजकुमार को अपनी भूल का एहसास हुआ। वह फूट-फूटकर रोने लगा। राजा ने उससे रोने का कारण पूछा, तो उसने सुबकते हुए बताया- ‘‘पिताजी, मैं शर्त हार गया। अब काला घोड़ा कभी नहीं आएगा।’’

इसके बाद राजकुमार उदयप्रताप ने अपने पिता को काले घोड़े की पूरी कहानी सुनाई। दरबार में बैठे मंत्री ने भी कहानी सुनी। पूरी कहानी सुनकर मंत्री ने कहा-‘‘राजकुमार, काले घोड़े का न आना ही ठीक है। जो लोग हमेशा दूसरों का मुँह ताकते हैं, वे आलसी हो जाते हैं। आपने देखा कि महाराज और आपके बड़े भाई दूसरों के भरोसे पौंधों के गायब होने का रहस्य नहीं जान सकें, जबकि आपने अपने बल पर सफलता प्राप्त कर ली। इसी प्रकार भविष्य में भी आपको सफलताएँ मिलेंगी।’’

 गुस्सा क्यों करते हैं आप?


मंत्री ने समझाने से छोटा राजकुमार प्रसन्न हो गया। अंत में उसने राजा से कहा-‘‘पिताजी, इस कहानी से मेरे भाइयों को भी अपना काम स्वयं करने की शिक्षा मिल गई होगी। अब आप बड़े भाई को राज सिंहासन पर बैंठने की आज्ञा देने की कृपा करें। मैं सब प्रकार से उनकी मदद करूँगा।’’

छोटे राजकुमार की बुद्धि एवं भाईयों के प्रति उसके मन में प्रेम भाव देखकर राजा वीरभद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए। राजा वीरभद्र ने छोटे राजकुमार की सलाह के अनुसार सबसे बड़े राजकुमार भानुप्रताप को राजा बनाने की घोषणा कर दी। छोटे राजुमार के व्यवहार से चारों भाइयों का परस्पर प्रेम और बढ़ गया।

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गुरुवार, 17 जून 2021

Best Hindi Story Karele- करेले हिंदी कहानी

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 करेले

गोरा गाँव में एक विधवा स्त्री गोमती रहती थी। उसकी एक ही बेटी थी। नाम था सुन्दरी। वह जन्म से ही गोरी-चिट्ठी और सुन्दर थी। जब वह बड़ी हुई, तो उसकी शादी के लिए तमाम धनी-मानी रिश्ते आने लगे। सुंदरी जिस रिश्ते के लिए राजी हुई, माँ ने उसी की हामी भर ली।

Hindi stories

जिस दिन सुन्दरी का शगुन चढ़ा, गोमती को उसी रात सपने में एक फुफकारता हुआ नाग दिखा। अब तो हर रात सपने में यही होता। वह नाग फुफकारकर उसे डसने के बताएं, उसके पैरों में अपना फन रखता। फिर उसे उसका बचन याद कराता। गोमती पसीना-पसीना होकर डरी-डरी सी उठ बैठती। सुन्दरी के बहुत पूछने पर वह केवल इतना ही कहती-‘‘कुछ भी तो नहीं, बेटी। मैं सोच रही हूँ, शादी के बाद जब तू अपनी ससुराल चली जाएगी, तो मैं बिलकुल अकेली रह जाऊंगी।’’

 दुष्टरानी और छोटा भाई

सुन्दरी को माँ ऐसा लाड़ प्यार भरी बातों से बहला देती। लेकिन उसके ब्याह के दिन जैसे-जैसे समीप आने लगे, गोमती उस नाग के डर से पीली पड़ने लगी। होते करते सुन्दरी का तिलक चढ़ गया। आखिर लगन मंडप की स्थापना वाली रात, उस नाग ने सपने में माँ को यह चेतावनी दी-‘‘यदि सुन्दरी का ब्याह किसी और से हुआ, तो मैं सुन्दरी को शादी से पहले ही डस लूँगा।’’

अब तो गोमती और भी डर गई। उसे एक पुरानी बात याद आ गई। असल में सुन्दरी जब गर्भ में थी, तो गोमती को मसालेदार करेलों का चस्का लग गया था। आए दिन वह नदी के किनारे की अपनी बेल से करेले तोड़ लाती। उसी नाग ने चुपचाप एक दिन अपनी कुंडली में उसके पैरों को जकड़ लिया। वह भयभीत होकर वहीं गिर पड़ी। शाम का समय, दूर-दूर तक उसे बचाने वाला कोई नहीं था। वह नाग मनुष्य के स्वर में बोल रहा था-‘‘माँ डर मत! मैं तुझे डसूँगा नहीं बस, तू मुझे यही वचन दे कि तेरी जो कन्या होगी, उसे मेरे साथ ब्याह देगी।’’

 सभी में गुरू ही है समाया

गोमती बेचारी मरती क्या न करती। वह हारकर, उस नाग के साथ होने वाली अपनी बेटी की शादी का वायदा करके घर लौटी।

तीन महीने बीतने के बाद जब गोमती ने सुन्दरी को जन्म दिया, तो मानो उसे सांप संूघ गया। उसने सुन्दरी के पिता रघुनाथ को भी कुछ नहीं बताया। होते-होते सुन्दरी पूरे पंद्रह साल की हो गई। वह रघुनाथ की दुलारी बेटी थी। बचपन से ही ऐसी निडर कि अपने पिता के साथ नदी में तैरती थी। नदी में वह नाग उसे जब-जब दिख जाता। मगर सुन्दरी को डर नहीं लगता था।

लेकिन पिछले साल सुन्दरी के पिता गुजर गए। हुआ यह कि मूसलाधार बरसात के कारण नदी में भीषण बाढ़ आई। रघुनाथ ने उस बाढ़ में तमाम लोगों की जान बचाई, किन्तु खुद प्रचण्ड नदी के प्रवाह में समा गए। गाँव वाले रघुनाथ के उस परोपकार को नहीं भूले थे। वे सब उनकी बेटी की शादी में बढ़-चढ़कर हाथ बटाने की होड़ कर रहे थे।

रघुनाथ के न रहने पर दुखिया माँ ने नदी किनारे के खेत बाग बटाई पर गाँव के दूसरे किसानों को दे रखे थे। वह स्वयं न तो कभी उधर जाती थी और न सुन्दरी को जाने देती थी। उनके खेतों-बागों की फसल की आमदनी आधी ही रह गई थी। फिर भी वह सुन्दरी के हाथ पीले करने के लिए एक-एक पैसा बचाकर रखती।

 इधर उधर

इन दिनों गोमती सुंदरी की देख रेख में बेहद चैकन्नी थीं। उसकी लगन चढ़ जाने के बाद भी वह उसे कभी अपनी आँखों से ओझल न होने देती थी। सब कुछ ठीक होने की प्रार्थना देवी देवताओं से करती। तमाम मनौतियाँ भी मांगती। दो दिन बाद सुन्दरी की बारात आने वाली थी। तमाम रिश्ते नाते के लोग और बच्चों से सुन्दरी की माँ का घर भरा हुआ था। किन्तु आश्चर्य! सुबह मुँह अँधेरी सुंदरी अपनी दो सहेलियों के साथ कुछ ही दूर नदी तट के अपने खेतों की तरफ निकल गई। गोमती उस समय गाँव से दूध लेने गई थी।

गोमती जब घर लौटी, तो पता चला कि सुन्दरी अब तक नहीं लौटी। सुनकर गोमती चीख पुकार मचाती हुई, उलटे पांव नदी की ओर दौड़ पड़ी।

गांव के तमाम लोग उस दुखिया मां की गुहार पर उसके पीछे दौड़ते भागते जब नदी के किनारे पहुंचे, तो वहाँ विचित्र दृश्य था। एक काला भुजंग सुन्दरी के गले से लिपटा हुआ था। सुन्दरी अपने बचाव के लिए चीख-पुकार रही थी। गोमती रोती हुई केवल यही कह रही थी-‘‘सुन्दरी बेटी! क्या करूँ, तेरी माँ ने करेले खाए थे।’’

कई साहसी तैराक नदी में कूदे भी, लेकिन उस भयानक नाग की फुुफकारों से डरकर वे सुन्दरी तक नहीं पहुंच पाए। नदी के इस पार भीषण कोहराम मचा हुआ था। साॅप, सुन्दरी को मंझधार के गहरे पानी में खींचे ले जा रहा था। देखते ही देखते सुन्दरी उस नदी के गहरे पानी में डबू गई।

आकाश से गिरा

इसी हाहाकार और कोहराम में एक सजीला सलोना नवयुवक उस डूबी हुई सुन्दरी की बांह पकड़े हुए पानी पर तैर आया। वह तैरता हुआ सुन्दरी को नदी के इस पार गांव वालों के पास ला रहा था।

नजदीक आने पर लोगों ने ध्यान से देखा सुन्दरी के गले में लिपटा हुआ साॅप, कहीं अदृश्य हो गया था। घाट पर पहुंचते ही कुछ लोग सुन्दरी को होश में लाने का उपचार करने लगे। कुछ लोग हैरान थे कि वह अजनबी युवक कौन था? उस गहरे पानी में अचानक कैसे कहां से प्रकट हो गया?

‘‘सुन्दरी जिंदा है, गोमती। उठो, देखो तो!’’-लोगों की आवाजें गोमती के कानों में पड़ी। बहुत झकझोरने के बाद पहले मां और फिर सुन्दरी भी होश में आ गई। गांव वाले देवी माई का जय जयकार करने लगे। सुन्दरी की जान बचाने वाले युवक को कुछ जवानों ने कंधों पर उठा लिया। सभी हैरानी से उस युवक को देख रहे थे।

Hindi story

वह कहने लगा-‘‘आज मैं उस तपस्वी के शाप से मुक्त हो गया। मैं भी पहले एक मनुष्य ही था। एक जंगल में अपने दो साथियों के साथ शिकार पर गया था। एक बूढ़ा तपस्वी वहां एक वट के वृक्ष के नीचे तप कर रहा था। पशु-पक्षियों के हाहाकार से जैसे ही उसके नेत्र खुले, मैं उसके सामने पड़ गया। मेरा तीर जिस हिरन को लगा था, वह उस तपस्वी के पास ही दम तोड़ रहा था।

‘‘तपस्वी ने क्रोध में यह कहते हुए मुझे शाप दे दिया-‘अरे मूर्ख, तू निरीह प्राणियों का वध करता घूम रहा है, जबकि प्रकृति मां ने तेरे लिए फल-फूल, साग-सब्जी और अनाज के भण्डार भर दिये है। तू मानव धर्म के नाम पर बहुत बड़ा कलंक है। जा तू इन्हीं पशु पक्षियों की योनियोें मंे भटक, ताकि तुझे इनका दर्द महसूस हो।’

‘‘ मैं कटे हुए वृक्ष की तरह उस तपस्वी मुनि के पैरों में पड़कर क्षमा याचना करता रहा, गिडगिड़ाता रहा। आखिर मुनि का क्रोध शांत हुआ। तब उन्होंने शाॅप से मुक्ति की यह भविष्यवाणी भी की-‘सर्प योनि से तेरी मुक्ति एक सुन्दरी युवती के कारण होगी। वह सुन्दरी और कोई नहीं तेरे पूर्व जन्म की पत्नी होगी। तब तू फिर मनुष्य बन जाएगा। उसी से तेरा विवाह भी होगा।’’

मिला वरदान।

फिर तो उन दोनों को फूल मालाएँ पहनाई गई। अगले दिन उनका विवाह हो गया।

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सोमवार, 14 जून 2021

Best Story In Hindi Paropakaaree Bhaee परोपकारी भाई कहानी हिंदी में

Paropakaaree Bhaee Story In Hindi| परोपकारी भाई कहानी हिंदी में
Paropakaaree Bhaee Story In Hindi| परोपकारी भाई कहानी हिंदी में

 परोपकारी भाई

एक गरीब किसान के दो पुत्र थे। दोनों में परोपकार की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। अपने आवश्यक कार्यों को छोड़कर भी दोनो लाचार व्यक्तियों की सेवा में लगे रहते थे, जिसके कारण किसान पिता उन्हें रोज डाटते-फटकारते रहते थे। अपने बच्चों को काम के प्रति लापरवाही बरतते देख उसके पिता ने उन्हें घर छोड़ने की आज्ञा दे दी।

दोनों भाई घर छोड़कर बाहर निकल पड़े। चलते-चलते शाम हो गई। दोनों भाइयो ने एक वृक्ष के नीचे ही रात काटने की सोची। सूखे पत्तों और घास को इकट्ठा करके दोनों ने बिछावन बनाया और उसी पर सो गये।

Kahani in Hindi

 नींद अभी आ ही रही थी कि सफेद कबूतर जो कि किसी बहेलिये के तीर से घायल हो चुका था। फड़फड़ाते हुए बिछावन पर आ गिरा। दोनों की नींद एकाएक खुल गई। कबूतर की स्थिति दयनीय थी। दोनों भाइयों ने सारी रात जागकर उसकी सेवा की। सारी रात गोद में रखकर अपनी मानवता का परिचय दिया उन दोनों भाइयों ने।

परोपकार का पौधा

सुबह दोनों पहाड़ी पार करने की योजना बना रहे थे ताकि पहाड़ के उस पार जाकर लोगों की बस्ती में धन उपार्जन कर सकें और अपने गरीब पिता की सहायता करें। बडे़ भाई रमेश ने छोटे भाई महेश से कहा तुम कुछ आम के फलों को तोड़कर ले जाओं जिससे भूख मिटाई जाये। 

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महेश ने लक्ष्मण की तरह अपने भाई की आज्ञा मान ली। और अतिशीघ्र आमों को तोड़कर ले आया। दोनों ने आम खाएं  और पहाड़ी पार करने के उद्देश्य से दोनों चल पड़े।

कबूतर को गोद में लिए रमेश आगे था। महेश पीछे पीछे चल रहा था, उसी समय कबूतर बोला तुम लोग अगर मुझे घर छोड़ देते तो मैं दोनों का यह अहसान कभी नहीं भूलता। 

दोनों भाइयों ने जब उसके घर के विषय में पूछा तो कबूतर ने बताया-‘‘पहाड़ी के बीच पक्षियों का एक विशाल साम्राज्य है जहाँ के राजा मेरे पूज्य पिता हैं। वे मुझे न पाकर काफी शोकाकुल होंगे। कबूतर की दया भरी याचना सुनकर दोनों भाइयों ने उसे घर पहुंचाने की योजना बनाई।

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पहाड़ी के बीच पक्षियों का विशाल साम्राज्य दिखाई देने लगा। पक्षीराज के सीमा में प्रवेश करते करते शाम हो गई। पक्षियों का यह देश अपने राजकुमार के न आने के गम में दुखी था। ताल तलैया में जमें शैवाल की घास यहीं बता रही थी कि हंसों का विचरना कई दिनों से बंद है।

उल्लू ने घायल कबूतर को देखा, फिर क्या था? उड़कर राजभवन पहुंचा और पक्षीराज को इस बात की सूचना दे दी। पक्षीराज अपने राजकुमार को जीवित पाकर खुशी से झूमने लगे। संदेश वाहक कौओं को शीघ्र इसकी सूचना सम्पूर्ण पक्षी साम्राज्य में देने की आज्ञा मिली।

मनुष्य अपना स्वामी स्वयं

कोयल ने अपने मीठे स्वर में स्वागत गीत प्रस्तुत किया। मोेर राजभवन में नाचने लगा। पक्षीराज को राज कुमार कबूतर ने सारी घटना सुनाई। ईमान स्वरूप दोनों भाइयों को सोने और चांदी का सिक्का दिया गया दोनों भाई घर आ गए तथा अपने गरीब पिता को परोपकार से पाया हुआ ध न प्रदान किया। 

किसान पिता अपने दोनंों बेटों से बेहद खुश हो गया तथा उसे भी परोपकार का महत्व समझ आया।

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